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विश्व पटल पर भारत की धमाकेदार धमक

  • मंतोष कुमार सिंह

हिन्दुस्तान आजादी की 60 वीं वर्षगांठ मना रहा है। इन 60 सालों में देश ने हर क्षेत्र में तरक्की की है। विकास के अनगिनत कीर्तिमान रचे गए हैं। 1947 और 2008 के भारत में जमीन-आसमान का अंतर है। तीव्रगति से शिखर की ओर अग्रसर अर्थव्यवस्था, सूचना प्रौद्योगिकी, विज्ञान, रक्षा, खाद्यान्न और बाजार सहित लगभग सभी क्षेत्रों में बढती आत्मनिर्भरता ने देश को विश्व पटल पर एक शक्ति के रूप में उभारा है। अमरीका की प्रसिद्ध आर्थिक पत्रिका 'फोर्ब्स की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में अरबपतियों की संख्या में उल्लेखनीय वृध्दि हुई है। दुनिया के शीर्ष 100 अरबपतियों में 40 भारत के हैं। इन धानबांकुरों की वार्षिक संपत्ति भी 170 अरब डालर तक पहुंच चुकी है। इन 60 वर्षो में भारतीय उद्योगपति जापानियां के मुकाबले काफी समृध्द हुए हैं। भारत का औद्योगिक साम्राज्य तेजी से विश्वबाजार में अपनी हिस्सेदारी बढा रहा है। देश में इस समय करोडपतियों की संख्या एक लाख को पार कर चुकी है। दुनिया के दस धानकुबेर सीईओ की फेहरिस्त में भारत के चार उद्योगपतियों ने जगह बनाई है। स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल, मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी और अजीम प्रेमजी शामिल हैं। फोर्ब्स ने मित्तल को दूसरे, मुकेश को छठे, अनिल अंबानी को सातवें और विप्रो के अजीम प्रेमजी को नौवे स्थान पर रखा है। अपनी 52 अरब डालर की संपत्ति के साथ वारेन ब्रफेट इस सूची में शीर्ष पर विराजमान हैं। वहीं आर्सेलर-मित्तल के प्रमुख लक्ष्मी निवास मित्तल की संपत्ति 32 अरब डालर की आंकी गई है। जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुकेश अंबानी की संपत्ति 20.1 अरब डॉलर और अनिल अंबानी की संपत्ति 18.2 अरब डालर के करीब है। अजीम प्रेमजी की कुल संपत्ति 17.1 अरब डालर है। वहीं दुनिया की सूचना प्रौद्योगिकी सेवा प्रदाता क्षेत्र की 100 सर्वश्रेष्ठ कंपनियों में भारत की एक तिहाई कंपनियां शुमार हैं। जिनमें टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज, एचसीएल टेकनोलोजीस, जेनपैक्ट, डब्ल्यूएनएस ग्लोबल सर्विसेज प्रमुख हैं। आउटसोर्सिन्ग की प्रमुख कंपनियों के प्रमुखों को विश्वसनीय, अभिनव और टेकनोलॉजी सेवी भागीदारों की पहचान करने में मदद के लिए साइबर मीडिया और ग्लोबल सर्विसेज मैगजीन द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में बताया गया कि 100 सर्वश्रेष्ठ कंपनियों में भारत की 29 कंपनियां शामिल हैं। दस श्रेणियों में शीर्ष स्थान पाने वाली कंपनियों में से भारत और अमरीका की चार-चार तथा चीन और मैक्सिको की एक-एक कंपनियां शामिल हैं। भारत की सेवा प्रदाता ये कंपनियां अपने राजस्व का दो तिहाई से तीन चौथाई अमरीका से अर्जित करती हैं, लेकिन अब वे अमरीका पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती हैं। भारत वैश्विक सेवा प्रदाता का केंद्र बन गया है और 57 प्रतिशत कर्मचारी सेवा प्रदाता केद्रों में कार्यरत हैं। जिनके कार्यालय भारत में ही हैं, जबकि 18 प्रतिशत अमरीका में हैं। भारतीय कंपनियों के अलावा अमरीका की इडीएस, सिटेल, ईपीएएम सिस्टम और कम्प्यूटर साइंसेज कॉर्पोरेशन तथा चीन की न्यूसोट और मेक्सिको की साटटेक इस सूची में शामिल होने वाली प्रमुख कंपनियां हैं। देश में विदेशी निजी शेयर पूंजी निवेश कंपनियों का वार्षिक इक्विटी अगले दो वर्षों में 40 अरब डालर तक पहुंच जाने का अनुमान है और इसका सबसे ज्यादा लाभ जमीन जायदाद क्षेत्र को मिलेगा। अभी ऐसी 400 कंपनियां भारत में निवेश कर रही हैं। 2010 तक इनकी संख्या 70 तक बढ सकती है। इस इक्विटी निवेश का सबसे ज्यादा लाभ रियल स्टेट क्षेत्र को मिलेगा, क्योंकि इससे उनका मुनाफा 35 से 50 प्रतिशत तक हो सकता है। रियल स्टेट क्षेत्र की भारत की तेजी से मजबूत होती अर्थव्यवस्था में बडी भूमिका है। वर्ष 2007 में भारत में सबसे ज्यादा इक्विटी निवेश हुआ। इन कंपनियों में 17.14 अरब डालर के करीब निवेश किया था। इनमें चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश की भी कंपनियां शामिल थीं। इस दौरान भारत के मुकाबले चीन में 50 प्रतिशत से भी कम 8.3 अरब डालर का निवेश हुआ जबकि 2006 में भारत के सात अरब डालर के मुकाबले चीन में 13 अरब डालर का पीई विदेशी निवेश हुआ था। रियल स्टेट क्षेत्र में वर्ष 2005 में मात्र 10 लाख डॉलर का निवेश हुआ था, जो एक साल बाद बढकर 89 करोड डालर पर पहुंच गया। रियल स्टेट के अलावा सूचना प्रौद्योगिकी, बैकिंग, वित्ता सेवाओं तथा स्वास्थ्य और फार्मास्यूटिकल क्षेत्रों में विदेशी निवेश बढा है। वर्ष 2007 में विदेशी निवेश करने वाली ऐसी कुल 386 कंपनियां थीं। वहीं आईटी और उससे जुडी कंपनियों में कुल 66 करार हुए। वर्ष 2007 प्रमुख निवेशों में टेमसेक होल्डिंग ने भारती एअरटेल में 109 करोड 60 लाख डालर का निवेश किया। डयूश बैंक और सिटी ग्रुप तथा विदेशी निवेशकों ने जीएमआर में एक अरब डालर का तथा आईसीआईसीआई वेंचर पंड ने जीपी इंट्राटेक में 89 करोड डालर का निवेश किया। भारत की आर्थिक, समाजिक और राजनीतिक परिदृश्य का लोहा अमरीका भी मान चुका है। इसे भारत और अमरीका के बीच हुए 123 परमाणु समङाते के रूप में देखा जा सकता है। 60 सालों में विभिन्न क्षेत्रों में विकास पर एक नजर डालने पर पता चलता है कि जनसंख्या विकराल रूप से बढी है। जनसंख्या की बढोत्तारी से सरकार परेशान रही। इस पर नियंषण के लिए कई कदम उठाए गए लेकिन पूरी सफलता नहीं मिल पाई है। 1950 -51 में भारत की आबादी 359 मिलियन थी जो 2005-06 में 1112 मिलियन पर पहुंच गई। 1960-61 में 434 मिलियन,1970-71 में 541,1980-91 में 679 ,1990-91 में 839 और 2000-01 में 1019 मिलियन आबादी थी। नई तकनीकी और कृषि क्रांति के चलते खाद्यान्न में उल्लेखनीय बढोत्तारी हुई है। जनसंख्या के बढते घनत्व के चलते कृषिभूमि कम होती जा रही है, फिर भी खाद्यान्नों के उत्पादन में वृध्दि जारी है। भारत में दलहन की सबसे ज्यादा खेती होती है। दुनिया के 50 प्रतिशत आम की पैदावार यहां होती है। कृषि क्षेत्र में 65 प्रतिशत लोगों को रोजगार मिला हुआ है और लाखों गांव खेती पर निर्भर हैं। 1950-51 में 50.8, 1960-61 में 82.0,1970-71 में 108.4, 1980-81 में 129.6 1990-91 में 176,2000-01 में 196.8 और 2006-07 में 209.2 (अग्रिम अनुमान) मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ है। आजादी के बाद प्रति व्यक्ति आय भी अच्छी खासी वृध्दि हुई है। प्राइवेट और आईटी सेक्टर में रोजगार के अनगिनत अवसर उपलब्धा हुए हैं। अब खुदरा बाजार में भी रिलायंस जैसी बडी कंपनियां उतर चुकी हैं, जिसके चलते लाखों की संख्या में रोजगार उपलब्धा हुए हैं। रोजगार के कारण प्रति व्यक्ति आया में भी इजाफा हो रहा है। 1950-51 में प्रति व्यक्ति आय 3687,1960-61 में 4429,1970-71 में 50025,1980-81 में 5352, 1990-91 में 7321,2000-01 में 16133 और 2006-07 में 22483 रुपए (अनुमान) थी। बिजली के उत्पादन में भी प्रतिदिन इजाफा हो रहा है,लेकिन बढती जनसंख्या के चलते मांग और पूर्ति के बीच खाई बनी हुई है। आज भी लाखों गांव बिजली की पहुच से दूर हैं। हालांकि सभी राज्य सरकारें विद्युत उत्पादन में वृध्दि करने में लगीं र्हुईं हैं। 1950-51 में प्रति घंटे विद्युत उत्पादन 5.1 अरब किलोवाट,1960-61 में 16.9,1970-71 में 55.8,1980-81 में 120.8, 1990-91 में 264.3,2000-01 में 499.5 और 2005-06 में 623.2 (केवल जनोपयोगी) दर्ज की गई। विदेशी व्यापार और विदेशी मुद्रा संपदा में भी 60 वर्षों में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। आयात और निर्यात दोनों क्षेत्र में बढोत्तारी जारी है। अनेक विदेशी कंपनी भारत में निवेश कर रही हैं। वहीं भारतीय कंपनियां और उद्योगपति भी विश्व पटल पर नई पहचान बनाने में कामयाब रहे। देसी कंपनियां तेजी से विश्व में पैर पसार रही हैं। जिसका व्यापार और मुद्रा संपदा पर खासा असर पडा। 1950-51 में आयात 1273 और निर्यात 1269 मिलियन डालर था,जो 2006-07 में बढकर क्रमश: 181368 व 124629 मिलियन डालर पर पहुंच गया। विदेशी मुद्रा संपदा भी 1.9 से बढकर 191.9 अरब डालर हो गई। विकास की रतार को देखकर कई वैज्ञानिक, आर्थिक और अन्य रिपोर्टों में यह खुलासा हो चुका है कि भारत 2020 तक महाशक्ति बन जाएगा।

1 comment:

anwar said...

achcha hai mantosh bhai. lage raho