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दो महापुरुषों के अवसान का दुख

  • मंतोष कुमार सिंह
भारत माता ने कई ऐसे सपूतों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने ओज से देश को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को रोशन किया है। ऐसी ही दो महान हस्तियां योग गुरु महर्षि महेश योगी और समाजसेवी बाबा आमटे अब हमारे बीच नहीं रहे। दोनों महापुरुषों ने अपने-अपने क्षेत्र में ऐसे कीर्तिमान रचे हैं, जिसे युगों-युगों तक याद किया जाएगा। सैकडों-हजारों सालों बाद ऐसे व्यक्तित्वों का धारती पर अवतार होता जिनके चेहरे पर तेजस्विता, शीतलता, अथाह करुणा, गरिमा, गंभीरता और पूर्णता होती है। वास्तव में ऐसे लोग युगपुरुष होते हैं। ऐसे युगपुरुषों का काल स्वयं अभिनन्दन करता है। दिशाएं सिर झुकाकर वर मालाएं पहनाती हैं। पृथ्वी स्वयं ही नतमस्तक हो जाती है। धारती का वह भाग सौभाग्यशाली हो जाता है जहां इस प्रकार के युगपुरुषों के चरण पडते हैं।
ऐसे ही महापुरुष थे बाबा आमटे जिन्होंने अपना सारा जीवन वंचितों और समाज के पिछडे वर्ग के लोगों की सेवा में लगा दिया। वे जीवन के अंतिम पडाव तक दबे कुचले लोगों की भलाई और समाज में हेय हष्टि से देखे जाने वाले कुष्ठ रोगियों के बारे कुछ न कुछ करते रहे। बाबा आमटे कुष्ट रोगियों, अपंगों, आदिवासियों तथा समाज से तिरस्कृत अन्य लोगों की अंतिम उम्मीद थे। उन्होंने गांधीवादी मूल्यों को स्थापित करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया। बाबा आमटे का जन्म 24 दिसंबर 1914 को महाराष्ट्र के वध जिले में हिंगनघाट में हुआ था। बाबा का पूरा नाम मुरलीधार देवीदास आमटे था। उनके पिता देवीदास हरबाजी आमटे शासकीय सेवा में थे। उन्होंने देश से भेदभाव मिटाने और एकता बनाए रखने के लिए जीवन भर संघर्ष किया। एक दिन बाबा ने एक कुष्ठ रोगी को बरसात में भीगते हुए देखा तो उनका मन करूणा से भर गया। बस यहीं से बाबा के जीवन को एक नई दिशा मिल गई। अपनी पत्नी साधानाताई और पुषों के साथ उन्होंने आनंदवन आश्रम की स्थापना की। इसके अलावा कुष्ठ रोगियों के लिए उन्होंने सोमनाथ और अशोकवन जैसे आश्रमों की भी स्थापना की जहां आज हजारों कुष्ठ रोगियों की सेवा की जाती है। बाबा आमटे भारत के सच्चे सपूत थे और उनका जीवन जनसेवा करने वाले लोगों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगा। आमटे ने आम लोगों खासतौर पर गरीब और पिछडे लोगों की सेवा में अपना जीवन लगाया और उनसे प्यार और स्नेह पाया। उनके निधान से न सिर्फ उन लोगों को बल्कि पूरे राष्ट्र की क्षति हुई है। बाबा आमटे हमेशा ही आशावादी रहे। उन्होंने एकबार बीबीसी को दिए गए साक्षात्कार में कहा था कि अमीरी एक उबाऊ चीज है और लगातार अमीर होते युवा एक दिन नई राह ढूढेंगे। आगे आने वाले दिनों में युवाआं को सक्रिया राजनीति में हिस्सा लेना ही होगा, क्योंकि युवाओं के बिना कोई भी राजनीति बांङा है। बाबा पडोसी मुल्क पाकिस्तान को भी अपना ही देश मानते थे। वे कहते थे कि सिर्फ भारत ही नहीं मैं पडोसी देश पाकिस्तान को लेकर भी बहुत आशावादी हू। मुङो आशा है कि बहुत जल्द ही दोनों मुल्कों के बीच सीमाएं समाप्त हो जाएंगी, लोग एक दूसरे से मुक्त व्यापार कर सकेंगे। हमारे देश का पानी पाकिस्तान के बासमती को उगाता है जिसे वे सारी दुनिया में बेचते हैं, तो यह कैसे दो देश हुए। उन्होंने 1949 में बंजर भूमि में कुष्ठ रोगियों के लिए आनंदवन आश्रम की स्थापना की थी। इसकी शुरुआत 14 रुपए और छह कुष्ट रोगियों से हुई थी। आनंदवन इस समय तीन हजार लोगों के पुनर्वास का केंद्र बन गया है। इस समय आश्रम में विश्वविद्यालय, अस्पताल, अनाथालय, तकनीकि इकाइयां हैं तथा यहां डेरी और खेती भी होती है।
दूसरी ओर संतुलित जीवन शैली से जुडी धयान और योग की भारतीय पारंपरिक विधा से पश्चिमी देशों को परिचित कराने वाले योग गुरु महर्षि महेश योगी का हालैंड के एम्सटर्डम में पिछले दिनों निधान हो गया।
उनका जन्म छत्तीसगढ की तीर्थभूमि राजिम के नजदीक एक छोटे से गांव पांडुका में 12 जनवरी 1917 को हुआ था। महर्षि महेश योगी का असली नाम महेश वर्मा था। बचपन में ही वे अपना गांव छोडकर जबलपुर चले गए थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्ष में स्नातकोत्तार की उपाधि ली थी। 1939 में वह स्वामी ब्रहमानन्द सरस्वती के अनुयाई बन गए थे। महर्षि योगी ने 40 और 50 के दशक में हिमाचल में अपने गुरु से धयान और योग की शिक्षा ली। उन्होंने 1958 में विश्व भ्रमण की शुरुआत की। विश्वभर में प्रसिध्दा संगीत बैंड बीटल्स के गुरु रहे महर्षि योगी जनवरी-2008 में अपने संस्थान के अधयक्ष पद से यह कहते हुए हट गए थे कि अब वह निशब्दता के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं और तभी से उन्होंने मौन धाारण कर लिया था। धयान और योग के माधयम से मनुष्य जीवन को संतुलित जीवन का पाठ पढाने वाले महर्षि योगी अपने प्रारंभिक जीवन को बहुत रूचिकर नहीं मानते थे इसलिए उन्होंने इस बारे में कभी खुल कर बात नहीं की। जीवन परमआनंद से भरपूर है और मनुष्य का जन्म इसका आनंद उठाने के लिए हुआ है, योगी के दर्शन का मूल आधाार यही था। वे कहते थे प्रत्येक व्यक्ति में ऊर्जा, ज्ञान और सामर्थ्य का अपार भंडार है तथा इसके सदुपयोग से वह जीवन को सुखद बना सकता है। दुनिया भर में सुख, शांति और समृध्दि का संदेश देने वाले महर्षि योगी ने शिक्षा के प्रसार के लिए विश्वव्यापी स्तर पर स्कूल और विश्वविद्यालय खोले। महेश योगी ने 150 देशों में पांच सौ से अधिाक स्कूल खोला है। दुनिया में चार महर्षि विश्वविद्यालय और चार देशों में वैदिक शिक्षण संस्थान हैं। योगी के संगठन के पास इस समय 160 अरब रुपए की संपत्तिा है। महर्षि योगी ने वेद और आधयात्मिकता के माधयम से संसार के नवनिर्माण के संकल्पना की आधारशिला रखी। उनके जैसा कोई नहीं था और न ही संभवत: आगे कोई होगा। 1941 में वह स्वामी ब्रहमानन्द सरस्वती के सचिव बन गए जिन्होंने उन्हें बाल ब्रहमाचार्य महेश नाम दिया। वे ब्रहमनान्द सरस्वती के साथ 1953 तक रहे। 1953 में महर्षि योगी ने संतों की घाटी उत्ताराकाशी की ओर रूख किया। महेश योगी हरिद्वार के बिल्कुल पास बसे ऋषिकेश को अपनी दूसरी जन्म स्थली मानते थे, लेकिन हैरानी की बात यह है कि महर्षि कभी धार्मनगरी हरिद्वार में नहीं आए। भागीरथी के तट पर नौ वर्षों तक कठोर साधाना कर विश्व के 192 देशों में भावातीत धयान तथा योग का परचम लहरा कर भारत को विश्व गुरु के सिंहासन पर बिठाने की दिशा में तेजी से बढ रहे महर्षि महेश योगी उत्तारकाशी को अपना घर तथा उत्ताराखंड को भारत का सिर मानते थे। आज भी गजोली तथा कुंसी आश्रम में भारतीय संस्कृति में रच बस गए 120 विदेशी भक्त भावतीत धयान के लिए यहां पर मौजूद हैं। महर्षि वेद विज्ञान विद्यापीठ में पंडित तैयार करने एवं रैथल में हजारों नाली जमीन पर निर्माणाधीन विश्वस्तरीय आयुर्वेदिक अस्पताल सहित कई संस्थाएं खडी कर उन्होंने अपने उत्तारकाशी प्रेम को प्रदर्शित किया है। महर्षि योगी अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनके विचार नीलगगन में हमेशा गुंजते रहेंगे। योगी कहते थे कि मानव जर्जरित होता जा रहा है, यदि कोई पेड खोखला हो जाए तो वह नहीं रह पाता। ठीक वैसे ही मनुष्य भी खोखला होने पर समाप्त हो जाएगा। दोनों युगपुरुषों को सत् सत् नमन।

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