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सालों की मेहनत खाक

  • मंतोष कुमार सिंह
यह भारत है। सबकुछ संभव है। यहां भगवान देता है तो छप्पड फाड के और लेता भी है तो छप्पड फाड के। कब किस पर प्रभु की दृष्टि अथवा कुष्टि पड जाए कहा नहीं जा सकता। कौन कब अर्श से फर्श पर आ जाए इसकी भविष्यवाणी भी नहीं की जा सकती है। शायद किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आठ बार ओलंपिक में स्वर्ण पदक जितने वाली भारतीय हाकी टीम ओलंपिक के लिए ही क्वालीफाई नहीं कर पाएगी लेकिन हमारे जांबाज खिलाडियों ने यह भी कर दिखाया। अस्सी साल की मेहनत को कुछ ही समय में खाक कर दिय। हमारे खिलाडियों ने ओलंपिक क्वालीफाईंग टूर्नामेंट के फाइनल में इंग्लैंड से 2-0 से हारकर बीजिंग ओलिंपिक में स्थान पाने का भारत का सपना तोड दिय। पिछले अस्सी वर्षों में यह पहली बार है कि भारत ओलिंपिक हाकी स्पर्धा का हिस्सा नहीं बन पाएगा। पूरे मैच में भारतीय खिलाडी संघर्ष करते नजर आए। भारत और इंग्लैंड के खेल में जमीन-आसमान का अंतर दिखा। इंग्लैंड के खिलाडी क्लोज मार्किंग, जल्दी पास देने और पोजिशन के मुताबिक खेलने की रणनीति पर डटे रहे। दूसरी ओर भारत के पास कोई योजना ही नजर नहीं आ रही थी। खिलाडियों में आपसी तालमेल का भी अभाव दिखा। भारतीयों ने कुछ अच्छे मूव बनाए लेकिन उन्हें अंजाम तक नहीं पहुंचा पाने की पुरानी कमजोरी फिर जाहिर हो गई। खिलाडियों का ध्यान अपने ही खेल पर रहा। जिसके कारण टीम को हार का मुंह देखना पडा। भारत ओलंपिक हाकी का स्वर्ण पदक आठ बार जीत चुका है। 1928 में पहली बार भारतीया हाकी टीम ने पूरी दुनिया पर विजय पताका फहराया था। टीम ने एम्सटर्डम में जयपाल सिंह के नेतृत्व में स्वर्ण पदक जीता था और सोना जीतने का सिलसिला लगातार 1956 तक जारी रहा। 1960 में फाइनल हारने के बाद 1964 में भारत पुनः स्वर्ण जीतने में सफलता प्राप्त की। इसके बाद 1968 और 1972 में फाइनल में पहुंचने में असफल रहा लेकिन कांस्य पदक जीतने में सफल रहा। बहिष्कारों के बीच हुए 1980 के मास्को ओलिंपिक खेलों में भारत को स्वर्ण जीतने में सफलता मिली। उसके बाद से वह कभी सेमीफाइनल में नहीं पहुंच सका। टीम को पताल में पहंचाले में भारतीय हाकी महासंघ (आईएचएफ) का अहम योगदान है। ओलंपिक में पहुंचने में भारत की नाकामी के लिए आईएचएफ के अध्यक्ष केपीएस गिल की तानाशाही नीतियां जिम्मेदार हैं। आईएचएफ मौजूदा पदाधिकारियों की राजनीति की भेंट चढ गया है। महासंघ में कोई भी व्यक्ति किसी पद पर आठ साल से अधिक समय तक नहीं रह सकता मगर इस प्रावधान की सरासर अनदेखी की गई है। गिल साहब 1994 से महासंघ के अध्यक्ष पद काबिज हैं। इन 14 सालों में हाकी ने वह सबकुछ गंवा दिया जिसे सहेजने में 80 साल लग गए थे। दरअसल भारतीय हाकी टीम का पतन गिल के पद संभालने के साथ ही शुरू हो गया था।

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