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नक्सलियों से लोहा लेने में कोताही क्यों ?

  • मंतोष कुमार सिंह
आतंरिक सुरक्षा के लिए प्रतिदिन खतरा बनते जा रहे नक्सलियों से लोहा लेने में पीडित राज्य सरकारें कोताही क्यों बरतती रही हैं, यह समझ से परे है। सरकारों की लापरवाही का नतीजा आम जनता और सुरक्षाकर्मियों को भुगतना पड रहा है। देश के 11 राज्य नक्सली हिंसा के शिकार हैं। पिछले साल नक्सली हिंसा में लगभग 50 प्रतिशत की वृध्दि हुई। पूरे देश में जितनी वारदातें हुईं उसके आधो से अधिक मामले अकेले छत्तीसगढ में हुए। 1960 के आसपास बंगाल के नक्सलबाडी से नक्सलवाद का जन्म हुआ। धीरे-धीरे नक्सलियों ने अपनी जडें मजबूत करनी शुरू कीं। 1985-95 में नक्सलियों ने मधय प्रदेश, छत्तीसगढ, आंधार प्रदेश, महाराष्ट्र, उडीसा, बिहार, उत्तार प्रदेश और झारखंड तक अपना नेटवर्क फैला लिया। गरीबों के मसीहा के रूप में जन्मे नक्सली उनका ही खुन पीने लगे। खून-खराबा, अपहरण, लूट आदि उनकी दिनचर्या बन गई और वे अत्याधुनिक हथियारों से लैस हो गए। आदिवासी और गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए नक्सली इन्हें अपने कुनबे में शामिल करते गए। फिलहाल नक्सल पीडित क्षेत्रों के लोगों का जीना दुर्भर हो गया है। प्रभावित क्षेत्र के लोगों को नक्सलियों के साथ-साथ सुरक्षा बलों के जवानों के शोषण का भी शिकार होना पडता है। दोनों ही आदिवासियों और गरीबों की बहू-बेटियों को अपने हवस का शिकार बनाते हैं। डर और दहशत के मारे ये लोग कुछ नहीं कर पाते। मुंह खोलने की सजा मौत के रूप में चुकानी पडती है। दूसरी ओर इस बात का खुलासा हो चुका है कि कई एनजीओ अप्रत्यक्ष रूप से नक्सलियों की मदद करते हैं। इन एनजीओ के माधयम से विदेशी पूंजी नक्सलियों को मिल रही है। नक्सली हिंसा में वृध्दि की मुख्य वजह भ्रष्टाचार भी है। केंद्र सरकार से नक्सली उन्मूलन के लिए मिलने वाली राशि अफसर डकार जाते हैं। इसका लेखा-जोखा लेने वाला कोई नहीं है। भ्रष्टाचार के चलते खुफिया सूचना तंत्र भी पंगू बना हुआ है। ऐसे में नक्सली बडी वारदातों को अंजाम देने में सफल हो जाते हैं।
किसी बडी नक्सली वारदात के बाद राजनेता साहसिक प्रतिक्रिया देकर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड लेते हैं। अगर इस बात का बीडा उठा लिया जाए कि नक्सली समस्या से किसी भी सूरत में निजात पाना है तो लक्ष्य थोडी सी मेहनत के बाद जरूर मिल जाएगा। इसका ताजा उदाहरण पिछले दिनों उडीसा में देखने को मिला। पांच सौ की संख्या में नक्सलियों ने नयागढ जिले में पुलिस थानों, प्रशिक्षण स्कूल और जिला शस्त्रागार पर हमला कर कई जवानों को मौत के घात उतार दिया तथा भारी मात्रा में हथियार लूट ले गए। हमले के बाद राज्य सरकार और पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए नक्सलियों के खिलाफ नकेल कस दी। साहसिक कदम उठाते हुए 1500 जवानों ने फुलबनी जिले की कुपारी पहाडी पर छिपे 300 नक्सलियों को चारों ओर से घेर लिया और कई दिनों तक चली मुठभेड में अधिाकांश नक्सलियों को मार गिराया। इस अभियान में पहली बार वायुसेना के हेलीकाप्टरों को भी लगाया गया था। राज्य सरकार ने पडोसी राज्यों से भी मदद लेकर नक्सलियों के नाक में दम कर दिया। साथ ही हमले में लूटे गए 115 राइफलें, एक कारबाइन और एक ट्रक गोला बारूद बरामद कर लिया। यह कार्रवाई कई दिनों तक चली। नक्सलियों के पास से और हथियार और विस्फोटक सामग्री भी जब्त की गई। इतना ही नहीं कई खुंखार नक्सलियों को पुलिस ने धार दबोचा। पुलिस की सक्रियता और जबरदस्त पलटवार से नक्सली इधार से उधार सुरक्षित स्थान की तलाश में भागने लगे। सरकार के इस कदम की तारीफ की जानी चाहिए। इसे नक्सलियों के खिलाफ अब तक के सबसे बडे अभियान के रूप में देखा जा रहा है। सुरक्षा बल के जवान नक्सलियों के मांद में घुस कर उन्हें चुनौति दे रहे हैं। पीडित राज्यों को भी उड़ीसा से सबक लेते हुए नक्सलियों के खिलाफ आर-पार की लडाई छेड देनी चाहिए। इस प्रकार के साहसिक कदमों से नक्सलियों के हौसले पस्त होंगे और उनमें बिखराव शुरू होगा। यह सर्वविदित है कि सबको अपनी जान की परवाह होती है। ऐसे में जब नक्सलियों के खिलाफ चौतरफा हमला बोला जाएगा तो निश्चित तौर पर सफलता मिलेगी। बस कारगर रणनीति और उस पर अमल करने का जज्बा होना चाहिए। कोई भी समस्या ऐसी नहीं है जिसका समाधान न हो। बस उसे खोजने की जरूरत है। तमाम उपायों और दांवों के बावजूद नक्सली हिंसा में लगातार वृध्दि हो रही है। पुलिस और खुफिया तंत्र की मुस्तैदी को धात्ता बताते हुए नक्सली देश की आंतरिक सुरक्षा पर चोट कर रहे हैं। आतंकवाद पर काबू पाने में सरकार कुछ हद तक सफल रही है, लेकिन नक्सली गतिविधियों में तेजी से इजाफा हुआ है। छत्ताीसगढ की स्थिति तो जम्मू-कश्मीर और असम से भी विस्फोटक हो चुकी है। पिछले पांच सालों में यहां नक्सली हिंसा में दोगुनी वृध्दि हुई है। नक्सलियों ने छत्तीसगढ सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार की नाक में भी दम कर दिया है। वर्ष 2007 आतंकवादी घटनाओं की दृष्टि से अपेक्षाकृत राहत भरा रहा तथा आतंकवादी अपने कुत्सित मकसद में अपेक्षाकृत कम कामयाब हुए।
पूरे देश से मधय दिसंबर तक के प्राप्त आंकडों के अनुसार इस वर्ष आतंकवादी घटनाओं में कम से कम 2465 जानें गईं जिनमें 1125 आतंकवादी, 957 नागरिक और 333 सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों में नाटकीय कमी आई। वहां आतंकवाद संबंधी घटनाओं में 768 जानें गईं जो 1990 के बाद सबसे कम हैं। वर्ष 1990 में 177 मौतें हुई थीं। अगर सरकारी आंकडों पर नजर डालें तो नक्सली हिंसा की भयावहता की असली तस्वीर उजागर होती है। इस साल 20 नवंबर तक आतंकवादी और नक्सली हिंसा में कुल 393 जवान और पुलिस अधिाकारी शहीद हुए, जिनमें जम्मू-कश्मीर में 118, उत्तार-पूर्वी राज्यों में 71 और नक्सल प्रभावित राज्यों में 204 जवान मारे गए। जबकि अकेले छत्तीसगढ में 188 जवानों को जान से हाथ धोना पडा अर्थात देशभर में आतंकी और नक्सली हिंसा में मारे गए जवानों में आधो छत्तीसगढ के हैं। 20 नवंबर 2007 तक जम्मू-कश्मीर में 417 तथा उत्तार-पूर्वी राज्यों में 434 आतंकवादी मारे गए। वहीं नक्सल प्रभावित राज्यों में 127 नक्सली ढेर हुए। 127 में मात्र 65 नक्सली छत्ताीसगढ में मारे गए, जबकि 179 को गिरफ्तार किया गया।
इस साल प्रदेश में 164 निर्दोष लोगों को नक्सलियों ने अपना शिकार बनाया, जबकि पूरे देश में 401 लोग नक्सली हिंसा के शिकार हुए। कुल मिलकार नक्सली हिंसा में 732 लोगों की जान गई। अकेले छत्ताीसगढ में 417 हिंसा के शिकार हुए। इस साल देश में कुल 1350 नक्सली घटनाएं हुईं। इन आंकडों से स्पष्ट है कि नक्सली नासूर बनते जा रहे हैं। इनसे निपटने के लिए अब तक कोई कारगर रणनीति नहीं बनी है। पीडित राज्य सरकारें अपने-अपने ढंग से नक्सलियों से लड रहे हैं। संयुक्त रूप से कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। धाडल्ले से नक्सलियों के प्रशिक्षण् शिविर चल रहे हैं। जिनकी जानकारी सबको है। ऐसे में केंद्र और प्रभावित राज्य सरकारों को एक मंच पर आकर कोई कारगर रणनीति बनाकर नक्सलियों के खिलाफ चौतरफा धाावा बोल देना चाहिए तब जाकर सफलता मिलेगी।

1 comment:

dilip uttam said...

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