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परिसीमन की पीड़ा

मंतोष कुमार सिंह
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा प्रेषित नए परिसीमन को हरी झंडी देकर कई प्रमुख पार्टियों को मुश्किल में डाल दिया है। अब झारखंड और पूर्वोत्तार के चार राज्यों असम, मणिपुर, अरूणाचल प्रदेश एवं नागालैंड को छोडकर देश में आगामी लोकसभा चुनाव के साथ-साथ लगभग दर्जन भर राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव नए परिसीमन के आधार पर ही होंगे। अभी तक 1971 की जनगणना के आधार पर 1976 में बनाए गए निर्वाचन क्षेत्र ही चल रहे थे। परिसीमन की पीडा सबसे अधिक कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, जनता दल सेक्यूलर और बहुजन समाज पार्टी में देखने को मिल रही है। जिन राज्यों में इस साल विधानसभा के चुनाव होने हैं, वहां परिसीमन को लेकर गहमागहमी ज्यादा है। इन दिनों मधय प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, छतीसगढ और कर्नाटक के प्रत्येक नुक्कड और चौराहों पर नए परिसीमन के आधार पर होने वाले चुनाव की ही चर्चा हो रही है। हालांकि चुनाव आयोग् आगामी अप्रैल या मई में होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव को परिसीमन आयोग की रिपोर्ट के आधार पर चुनाव कराने में असमर्थता जाहिर की है। आयोग को परिसीमन रिपोर्ट पर राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद इसके अनुसार चुनाव कराने के लिए कम से कम तीन से चार माह के अतिरिक्त समय की जरूरत होगी। चुनाव आयोग विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने से पहले विधानसभा चुनावों को छह माह तक आगे बढा सकता है, लेकिन विधानसभा या लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने के बाद सदन को भंग करने का अधिकार चुनाव आयोग को नहीं है।
परिसीमन आयोग ने छह राज्यों को छोडकर देश में 3726 विधानसभा एवं 504 लोकसभा चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन पूरा कर लिया है। परिसीमन से अनुसूचित जाति के लोगों के लिए लोकसभा की सुरक्षित सीटों की संख्या 78 से बढकर 84 तथा अनुसूचित जनजाति के लिए 38 से बढकर 42 हो गई है। इसी तरह अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सीटों की संख्या में वृध्दि हुई है वहीं सामान्य सीटों की संख्या वर्तमान 402 से घटकर 392 रह गई हैं। विधानसभाओं में भी सुरक्षित सीटों में इजाफा हो गया है। अनुसूचित जाति के लिए जहां सुरक्षित सीटों की संख्या वर्तमान 555 से बढकर 610 हो गई हैं वहीं अनुसूचित जनजातियों के लिए यह संख्या वर्तमान 545 से बढकर 527 पहुंच गई हैं। ऐसे में अभी से कई दिग्गज नेता सुरक्षित क्षेत्रों की तलाश में जुट गए हैं। परिसीमन को लेकर मचे हाहाकार के कई कारण हैं।
गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पडा है। दोनों राज्यों में बसपा ने अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया है, जिसका फायदा परोक्ष रूप से भाजपा को मिला है। साथ ही मधय प्रदेश, झारखंड, छतीसगढ और राजस्थान जैसे जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां कांग्रेस के संगठन का ढांचा काफी कमजोर है? मधय प्रदेश में काफी मशक्कत के बाद सुरेश पचौरी को इकाई का अधयक्ष नियुक्त किया गया है। वहीं पडोसी राज्य और कभी मधय प्रदेश का हिस्सा रहे छतीसगढ में आपसी गुटबाजी चरम पर है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एक दूसरे की टांग खिंचने में लगे हुए हैं। केशकाल विधानसभा उपचुनाव में मिली करारी हार का ठिकरा एक दूसरे के सिर फोड जा रहा है। इससे पहले मालखरौदा और खैरागढ उपचुनाव में भी पंजे को हार का सामना करना पडा था। शिकस्त के पीछे गुटबाजी मुख्य वजह मानी जा रही है। मधयप्रदेश और छत्तीसगढ में पार्टी के पास संगठन के नाम पर सिर्फ प्रदेश अधयक्ष हैं। केंद्र में कांग्रेसनीत सरकार होने के बावजूद पार्टी को कई राज्यों में नेताओं की कमी से जुझना पड रहा है। हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिन राज्यों के चुनाव नतीजे आम चुनाव के लिए माहौल तैयार करेंगे, उन प्रदेशों में पार्टी अपनी प्रदेश कमेटी तक नहीं बना पाई है। वहीं राजस्थान में निष्क्रिय कमेटी के जरिए चुनावी जंग जीतने की तैयारी है। राजस्थान, मधयप्रदेश और छत्तीसगढ में भाजपा की सरकारें हैं। इन राज्यों में अक्टूबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में जीत से आत्मविश्वास से भरी भाजपा को कांग्रेस इन्हीं राज्यों में शिकस्त दे सकती है। पर पार्टी अभी तक संगठन तैयार नहीं कर पाई है। गुजरात में कांग्रेस बिना संगठन के चुनाव मैदान में उतरी थी। नतीजा सबके सामने हैं। कांग्रेस रणनीतिकार यह तो स्वीकार करते हैं कि चुनाव के संगठन का मजबूत होना बेहद जरूरी है लेकिन संगठन तैयार करने में पार्टी की कोई दिलचस्पी नहीं है। शायद इसकी अहम वजह वरिष्ठ नेताओं की किल्लत है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी परिसीमन के जरिए अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं में जान फूंकना चहती है। पार्टी का कहना है कि परिसीमन के दो फायदे हैं। पहला कांग्रेस संगठन में जंग खा चुके कई वृध्द नेता नए निर्वाचन क्षेत्र में अप्रासंगिक हो जाएंगे और उनसे मुक्ति मिल जाएगी। क्योंकि जनता अब उनसे छुटकारा पाना चाहती है। दूसरा, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के प्रति वफादार नए चेहरों को चुनौती देने का मौका मिलेगा। नए चेहरों के सहारे चुनावी नैया को पार लगाया जा सकता है। साथ ही कई राज्यों में अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के सीटों में हुए फेरबदल से बसपा की बजाए राजनीतिक समीकरण कांग्रेस के पक्ष में बदल जाएगा। इतना ही नहीं मुस्लिम बहुल इलाकों में से अधिकांश के सुरक्षित विधानसभा क्षेत्रों में आने से मुसलमानों का वोट बैंक भी कांग्रेस की झोली में आ सकेगा।
कई लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में परिसीमन से दलित एवं वनवासी वर्ग के लिए कुछ आरक्षित होने से कांग्रेस को फायदा नजर आ रहा है। दूसरी ओर भाजपा के अंदर भी गुणा-भाग का खेल खेला जा रहा है। वर्षों से अपने आपको सुरक्षित महसूस कर रहे कई दिग्गज भविष्य को लेकर व्याकूल हो गए हैं। उन्हें अब कुर्सी असुरक्षित महसूस होने लगी है। दरअसल परिसीमन से कई नेताओं के सीटों का गणित बिगड गया है। उनके सुरक्षित सीटों के इधार-उधार हो जाने से वे पसोपेश में हैं। वहीं नए एवं युवा नेताओं के चेहरे पर चमक देखी जा रही है। दरअसल काफी समय से मौके की तलाश में भटक रहे इन नेताओं के सामने अब उम्मीद की किरण नजर आने लगी है। इन्हें लगता है कि परिसीमन से अब चुनाव लडने का मौका मिलेगा। ऐसा होने से वे भी अपना जौहर चुनाव के मैदान में दिखा सकेगें। परिसीमन से कई सुरक्षित क्षेत्रों पर कब्जा जमा चुके पूराने चेहरों का वर्चस्व कम होगा और युवा पीढी को मौका मिलेगा। इससे स्पष्ट है कि उम्रदराज नेताओं के अंदर बेचैनी देखी जा रही है। जबकि जिनके अंदर काबिलियत और चुनाव जितने का मदा है। उन्हें किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं है। यह सच है कि प्रतिभावान लोगों को कहीं से भी चुनाव लडने से परहेज नहीं है। उनके लिए सभी सीटें सुरक्षित हैं।

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