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एक ही थैली के चट्टें-बट्टें

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उत्तार प्रदेश कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में यह जो कहा कि भाजपा समेत सपा और बसपा एक ही थैली के चंट्टे-बंट्टे हैं उसका निहितार्थ समझना कठिन है। यदि वह संप्रग के अपने घटकों पर नजर डालें तो नि:संदेह उन्हें ऐसे ही चंट्टे-बंट्टे अपने साथ भी खड़े दिखाई देंगे। आज जो स्थिति उत्तार प्रदेश में समाजवादी पार्टी की है वही काफी कुछ बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की है। इसी तरह की स्थिति संप्रग के कुछ अन्य घटकों की भी है। आखिर कांग्रेस की ओर से संप्रग के इन घटकों को किस तरह के चट्टे-बट्टें की संज्ञा दी जाएगी? उत्तार प्रदेश की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां कुछ अलग हो सकती है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि इस राज्य के बाहर के जो क्षेत्रीय दल संप्रग में शामिल है उनकी राजनीति के तौर-तरीके भी सर्वथा अलग है। जहां तक सपा और बसपा की बात है, क्या यह किसी से छिपा है कि विगत में कांग्रेस दोनों दलों के साथ तालमेल कर चुकी है? क्या कांग्रेस यह कहना चाहती है कि इन दलों में तब कोई खामी नहीं थी जब उसने उनसे हाथ मिलाया था? इस सवाल का जवाब भी सामने आना चाहिए कि पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा से सहयोग करने के लिए तैयार कांग्रेस अब सपा के साथ रिश्ते सुधारने के संकेत क्यों दे रही है? ऐसे संकेत तो कुल मिलाकर उन कार्यकर्ताओं को भ्रमित करने का ही काम करते है जिनकी सक्रियता के बगैर कोई दल स्वयं को सशक्त नहीं बना सकता। देश के सबसे बड़े राज्य में कांग्रेस ने एकला चलो का जो संकेत दिया उसमें कहीं कोई खामी नहीं, लेकिन केवल चुनाव के अवसर पर ही सक्रिय होकर पार्टी की खोई हुई जमीन को फिर से हासिल नहीं किया जा सकता। कांग्रेस इसके पूर्व भी अपने दम पर चुनाव मैदान में उतर चुकी है, लेकिन उसके नतीजे किसी से छिपे नहीं।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की तरह से पार्टी महासचिव राहुल गांधी ने भी कानपुर के मंच से आकर्षक भाषण दिया। उन्होंने एक नया नारा देते हुए कहा कि कांग्रेस के दोनों हाथ गरीबों के साथ है। दुर्भाग्य से आज जो स्थिति है उसमें यह नारा सार्थक नहीं नजर आता। बेलगाम महंगाई से यदि कोई सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है तो वह आम आदमी ही है। नि:संदेह बात केवल उत्तार प्रदेश में कांग्रेस की कमजोर स्थिति की नहीं, अन्य अनेक राज्यों में उसके खिलाफ बन रहे माहौल की है। इनमें वे राज्य भी शामिल है जहां कांग्रेस का शासन है। यह कहना कठिन है कि कांग्रेस शासित राज्य अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर आम आदमी को राहत प्रदान कर रहे है। कांग्रेस ने स्वयं के नेतृत्व में केंद्र में सत्तारूढ़ होते समय आम जनता से जो वायदे किए थे वे पूरे नहीं हो सके है। आगामी आम चुनाव में उसे इसके दुष्परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। कांग्रेस अपने मंच से खुद और दूसरों के बारे में मनचाही टिप्पणियां कर सकती है, लेकिन इतने मात्र से वह स्वयं को अन्य दलों से बेहतर नहीं साबित कर सकती। मौजूदा स्थितियों में कांग्रेस के लिए चुनौती सिर्फ उत्तार प्रदेश ही नहीं, बल्कि अन्य अनेक राज्य भी है। वह उत्तार प्रदेश के बाहर की चुनौतियों का सामना कैसे करेगी, इसके कोई संकेत कानपुर में सामने नहीं आ सके।
संपादकीय- जागरण
02 अप्रैल 2008

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