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बाइचुंग और आमिर

ओलिम्पिक मशाल की दौड़ में भागीदारी का मुद्दा इस बार विवाद में उलझ गया है। तिब्बत में जारी अशांति और चीन के दमनचक्र की छाया में हो रही इस दौड़ को लेकर दुनिया भर में मतभेद सामने आ रहे हैं। हमारे यहां यह मशाल 17 अप्रैल को नई दिल्ली में होगी। इस आयोजन में भाग लेने के लिए ओलिम्पिक असोसिएशन ने जाने-माने खिलाड़ियों और सिलेब्रिटीज को न्योता दिया है। तिब्बती आंदोलनकारी चाहते हैं कि ये लोग इस दौड़ का बहिष्कार करें। हमारे फुटबॉल कैप्टन बाइचुंग भूटिया पहले शख्स हैं, जिन्होंने इस अपील को मानते हुए खुद को दौड़ से अलग कर लिया है। भूटिया खुद बौद्ध हैं, जिनके पूर्वज तिब्बती थे। उन्होंने इसे धार्मिक और मानवतावादी मुद्दा मानते हुए कहा है कि उनके लिए इस आयोजन में शामिल होना सही नहीं होगा। लेकिन ज्यादातर लोग भूटिया के विचारों से सहमत नहीं हैं। मसलन आमिर खान ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि वे खेल और सियासत को आपस में जोड़ने के खिलाफ हैं। वे ओलिम्पिक को एक ऐसा आयोजन मानते हैं, जहां दुनिया अपने झगड़े भुलाकर एकजुट होती है। अगर हम मानवाधिकार के हनन को पैमाना मानें, तो फिर दुनिया में कोई देश ऐसा नहीं मिलेगा, जहां ओलिम्पिक आयोजित हो सकें। आमिर का यह भी कहना है कि वे चीन के लिए नहीं दौड़ेंगे, बल्कि उस वक्त उनके दिल में तिब्बतियों के लिए प्रार्थना होगी। दूसरे लोग भी इस विचार से सहमत हैं। उनका कहना है कि इस दौड़ में शामिल होना गर्व की बात है। हमारा मानना है कि अपनी भागीदारी तय करना एक निजी फैसला है, जिसका हक लोकतंत्र में सभी को है। ऐसे में यह गलत होगा कि भूटिया के फैसले को लेकर नाराजगी जताई जाए, जैसा कि पश्चिम बंगाल के खेल मंत्री सुभाष चक्रवर्ती कर रहे हैं। चक्रवर्ती इसे शर्मिन्दगी मानते हैं, लेकिन ऐसा कहना भूटिया की भावनाओं की अनदेखी करना होगा। इस लिहाज से ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन के प्रेजिडेंट और केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी की राय सही है कि भागीदारी तय करना भूटिया का मौलिक अधिकार है। बहरहाल, खतरा यह है कि इस विवाद को कहीं चीन बहाना न बनाए, जो पहले ही भारत में ओलिम्पिक मशाल की सुरक्षा का मुद्दा खड़ा कर रहा है। भारत सरकार को मशाल की सुरक्षा का हर इंतजाम करना चाहिए, लेकिन चीन को यह भी जता देना चाहिए कि वह अपने नागरिकों को इस मामले पर राय बनाने की पूरी आजादी देती है।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स
03 अप्रैल 2008

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