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भारतीय कूटनीति की परीक्षा

भारतीय कूटनीति के लिए सचमुच परीक्षा की घड़ी है। उसे तिब्बतियों और चीन के परस्पर विरोधी हितों के बीच समन्वय स्थापित करते हुए अपनी नैतिक और भौतिक साख बनाए रखने का कठिन काम करना है। जैसे-जैसे 17 अप्रैल की तारीख करीब आती जा रही है, वैसे-वैसे चीन की बेचैनी बढ़ती जा रही है। इसी दिन ओलिंपिक की मशाल भारत पहुंचेगी और तकरीबन बीस घंटे यहां रहेगी।
चीन को आशंका है कि भारत के तिब्बती आंदोलनकारी इस मशाल को क्षति पहुंचा सकते हैं। नई दिल्ली के चीनी दूतावास की दीवार फांदकर जिस तरह आंदोलनकारी दूतावास में घुस गए थे, उससे चीन की आशंका को स्वाभाविक बल मिलता है। एक बार तो चीन ने अपनी ओलिंपिक मशाल को भारत से न गुजारने का मन भी बना लिया था, लेकिन भारत सरकार और यहां की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा ठोस आश्वासन मिलने के बाद उसने अपना विचार स्थगित कर दिया।
यह सही है कि तिब्बत के मुद्दे पर भारत में एक तरह की सांस्कृतिक संवेदनशीलता मौजूद है और लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के नाते यहां रहने वाले हर व्यक्ति को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति का अधिकार भी है। भारत और चीन में यही बुनियादी फर्क भी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत अपनी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन हो सकता है। इस संदर्भ में विदेशमंत्री प्रणब मुखर्जी का यह वक्तव्य महत्वपूर्ण है कि दलाई लामा हमारे सम्माननीय अतिथि हैं और उनके एक लाख अस्सी हजार देशवासियों को भारतीय नागरिकों की तरह ही हर चीज की आजादी है, पर राजनीतिक गतिविधियां चलाने की छूट नहीं दी जा सकती।
यह एक संतुलित नीति है, क्योंकि हम नहीं चाहते कि जिस तरह राजनीतिक कारणों से 1980 में मास्को ओलिंपिक और 1984 में लास एंजिल्स ओलिंपिक ने अपनी विश्वसनीयता खो दी थी, वैसा कुछ 2008 के बीजिंग ओलिंपिक के साथ भी हो और उसका अपयश भारत को उठाना पड़े। अगर हमारे यहां बाइचुंग भूटिया जैसे खिलाड़ी हैं, जो तिब्बत के मसले को ओलिंपिक से ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं, तो दूसरी तरफ लिएंडर पेस और आमिर खान जैसे शख्स भी हैं, जो ओलिंपिक की मशाल थामने में गर्व का अनुभव करते हैं।
लोकतांत्रिक प्रणाली में विभिन्न विचारों की अभिव्यक्ति, उनके मानने वालों की स्वतंत्रता और उनका सम्मान संभव है, लेकिन यह संभव नहीं है कि कोई अपने विचार मनमाने ढंग से दूसरों पर थोप दे, इसलिए चीन को भारत की ओर से निश्ंिचत रहना चाहिए और सरकार को भी तिब्बतियों की मानवीय गरिमा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता कायम रखते हुए ओलिंपिक मशाल के सम्मान की भी रक्षा करनी चाहिए।
संपादकीय-भास्कर
04 अप्रैल 2008

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