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अफसरों की आपत्तिा

छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के सामने आने के साथ ही भारतीय प्रशासनिक सेवा को दी जा रही खास तरजीह और उसके वर्चस्व को लेकर जो आपत्तिायां एवं चिंताएं सामने आई हैं उन पर विचार किया ही जाना चाहिए। यह इसलिए और भी जरूरी है, क्योंकि भारतीय प्रशासन का फौलादी ढांचा कही जाने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा में जंग लगती दिख रही है। बात केवल इस सेवा के अधिकारियों के लोकसेवक की अवधारणा पर खरे न उतरने की ही नहीं है, बल्कि सामान्य दायित्वों का निर्वहन न हो पाने की भी है। यह निराशाजनक है कि सर्वाधिक अधिकारों से लैस होने के बावजूद भारतीय प्रशासनिक सेवा समाज और राष्ट्र की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही है। इन स्थितियों में समस्त प्रशासनिक ढांचे पर उसके दबदबे को लेकर सवाल खड़े होना स्वाभाविक ही है। यह सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं, क्योंकि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भ्रष्टाचार में भी लिप्त नजर आने लगे हैं। निश्चित रूप से भ्रष्टाचार के ये मामले बहुतायत में नहीं हैं, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इससे इस सेवा के अधिकारियों की छवि बिगड़ती चली जा रही है। हाल ही में छठे वेतन आयोग की सिफारिशें सामने आने के बाद आईपीएस और अन्य समकक्ष अधिकारियों ने आईएएस अफसरों के समक्ष खुद को जिस तरह उपेक्षित महसूस किया और अपना दर्द कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी बयान किया उसे समझा जाना चाहिए।
नि:संदेह बात केवल आईपीएस अधिकारियों के दु:ख-दर्द की ही नहीं, बल्कि अन्य सेवाओं के अधिकारियों की भी है। शायद ही ऐसा कोई राज्य हो जहां के प्रांतीय सेवा के अधिकारी आईपीएस अधिकारियों के समक्ष खुद को उपेक्षित न महसूस कर रहे हों। यह किसी के लिए शुभ नहीं कि प्रांतीय सेवा के अधिकारी स्वयं को कुंठित महसूस करें। अब समय आ गया है कि सर्वाधिक सक्षम आईएएस अधिकारियों को जवाबदेही के दायरे में लाया जाए। निश्चित रूप से इस सेवा के अधिकारियों की मेधा शक्ति पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता, लेकिन क्या कारण है कि यह मेधा समाज और राष्ट्र का भला करने में सहायक सिद्ध नहीं हो पा रही है? प्रशासनिक संवर्ग को ही इस पर आत्मचिंतन करना होगा कि सर्वाधिक मेधा शक्ति के धनी आईएएस अधिकारी आखिर आम जनता की अपेक्षाओं पर खरे क्यों नहीं उतर पा रहे हैं? मौजूदा स्थितियों में न केवल यह आवश्यक है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के सभी अधिकारियों के लिए बनी आचार संहिता में संशोधन किया जाए, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उस पर वास्तव में अमल हो। यदि इस आचार संहिता पर अमल नहीं हो सकता तो फिर प्रशासन से जुड़ी किसी भी आचार संहिता के पालन की उम्मीद नहीं की जा सकती। सरकार और आम जनता के बीच समन्वय तंत्र का कार्य करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की समस्याएं दूर होनी ही चाहिए, लेकिन इन अधिकारियों को भी यह सिद्ध करना होगा कि वे उन अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए सजग व सक्रिय हैं जो उनसे की गई हैं। यह तभी संभव है जब प्रशासनिक अधिकारी अपनी कार्यशैली में सुधार लाएं और आम जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनें।
संपादकीय- जागरण
07 अप्रैल 2008

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