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कुछ नए चेहरे

मनमोहन सिंह सरकार में सात नए मंत्रियों के प्रवेश और छह की विदाई एक बड़ा फेरबदल है, लेकिन सिर्फ संख्या के हिसाब से। सरकार के कुल ढांचे और मिजाज पर इससे कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ेगा। लिहाजा इस दावे को मानने में संकोच होता है कि पहले कई राज्यों के और उसके बाद लोकसभा चुनाव को देखते हुए यूपीए सरकार में कोई ओवरहॉलिंग हो गई है। हो सकता है कि सरकार इसकी जरूरत नहीं समझती हो और प्राथमिकताओं तथा परफॉर्मेन्स के लिहाज से यह टीम आगामी चुनौती के लिए फिट लगती हो, लेकिन चुनौती जितनी बड़ी है, उस हिसाब से टीम को कुछ ज्यादा जोश की जरूरत तो पड़ेगी। क्या यह जोश इस फेरबदल से झलकता है? इस सवाल का जवाब हमें मिलता है, लेकिन वह अधूरा है। जो दो नए युवा चेहरों (ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद) को इस बार सरकार में जगह मिली है और जिनकी वजह से यह फेरबदल कुछ चमकदार हो गया है, वे सही वक्त पर सही जगह हो सकते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि अब भी कांग्रेस नौजवानों पर जिम्मेदारी डालने से हिचक रही है। राहुल गांधी ने संगठन के काम के लिए मंत्री पद लेने से इनकार करते हुए अपने नेक ख्यालात का परिचय दिया है, लेकिन कुछ और नाम थे, जिन्हें इस मौके पर आगे लाया जा सकता था। ये सभी लोग पिछले चार बरसों से खुद को बड़ी चुनौतियों के लिए तैयार करते रहे हैं और इनके आने से मंत्रिमंडल की एनर्जी का लेवल बढ़ा हुआ दिखाई देता। बहरहाल, किसी भी युवा का सरकारी जिम्मेदारी में आना एक अच्छी बात है और हम सिंधिया और प्रसाद से एक दमदार पारी की उम्मीद कर सकते हैं। उन्हें खुद को कसौटी पर कसने का भरपूर मौका मिलने वाला है। ऐसा ही मौका एम।एस. गिल के लिए भी है, जो खेलों में भारत की दशा सुधारने और कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी की चुनौतियों से जूझेंगे। अभी उनके पास ऐसा कर दिखाने का कोई इतिहास नहीं है, लेकिन भविष्य वे जरूर बना सकते हैं, जिसके लिए उन पर सरकार ने भरोसा जताया है। जिन मणिशंकर अय्यर के प्रभारों का एक हिस्सा उन्होंने लिया है, वे गेम्स पर हो रहे खर्च से तकलीफ महसूस कर रहे थे। यह सरकारी लाइन के माफिक नहीं था। हालांकि अय्यर को एक काबिल नेता माना जाता है, लेकिन इस सरकार में शानदार शुरुआत करने के बाद उनके प्रभार घटते गए हैं। अब वे महज पंचायती राज और पूर्वोत्तर मामलों के मंत्री हैं, लेकिन चाहें तो वहां भी अपने काम की छाप छोड़ सकते हैं। इस फेरबदल में जिन छह लोगों का जाना हुआ, उनमें से दो राज्यसभा की अपनी मियाद पूरी कर चुके थे। ज्यादातर की विदाई को इस बात का संकेत बताया जा रहा है कि कमजोर कामकाज को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। शायद यह बात सही हो, लेकिन अच्छा होता कि इस संदेश को ज्यादा दमदार तरीके से सामने रखा जाता। कामकाज कैबिनेट में आने और बने रहने का पैमाना सचमुच है, तो इतनी धीमी आवाज में कहने से बात नहीं बनेगी।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स
08 अप्रैल 2008

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