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सुधार तो चाहिए

अच्छे इरादों की तो हमारे यहां कभी कमी नहीं रही। उन्हें अमल में कैसे लाया जाए, इसका फॉर्म्युला हमें कहीं से मिले तो सही। यह बात उस पैनल की सिफारिशों पर भी लागू होता है, जिसका गठन प्लानिंग कमिशन ने फाइनैंशल सेक्टर में सुधार सुझाने के लिए किया था। लेकिन इस पैनल के मुखिया रघुराम राजन का कहना है कि प्रैक्टिकल कानूनी उपायों के पीछे भले ही बौद्धिक असर न दिखता हो, लेकिन वे किसी भुला दी गई रिपोर्ट से ही प्रेरित होते हैं। यह एक आशावादी बयान है और हम तो चाहेंगे कि राजन कमिटी की रिपोर्ट इतनी प्रेरक साबित हो कि उसे भुला दिए जाने की स्टेज से न गुजरना पड़े। लेकिन हमें यह भी अहसास है कि यह आशावाद कुछ ज्यादा ही है। फाइनैंशल सेक्टर में रिफॉर्म की कई बड़ी कोशिशें आज भी अटकी हुई हैं। मसलन मुम्बई को इंटरनैशनल फाइनैंशल सेंटर बनाने के लिए मिस्त्री कमिटी की सिफारिशें धूल खा रही हैं। बैंकिंग और इंश्योरेंस सेक्टरों में विदेशी निवेश की लिमिट बढ़ाने की कोशिशें नाकाम साबित हुई हैं। ऐसे में राजन पैनल की रिपोर्ट का भविष्य भी कोई अच्छा नहीं लगता, कम से कम भुलाए जाने से पहले तो नहीं। बहरहाल, इस रिपोर्ट में एक बड़ा फर्क है, जो इसकी किस्मत बदल सकता है, हालांकि इसके लिए भी राजनीतिक इरादों की जरूरत होगी। यह रिपोर्ट बड़े बदलावों की नहीं है। जैसा कि राजन ने कहा है, बड़े मुद्दों पर विवाद होने लगते हैं, लेकिन हम छोटे-छोटे सौ कदम उठाकर क्यों नहीं बदलाव ले आएं। यह रिपोर्ट ऐसे ही कदमों के बारे में है और इसके सुझाव वाकई अच्छे हैं। मसलन कृषि उपजों की गोदाम रसीदों को खरीदे-बेचे जाने योग्य बनाया जाए, ताकि उनके बदले खेती के लिए सस्ते वित्त का इंतजाम हो सके। इसी तरह विदेशी निवेशकों के लिए ब्रांड मार्केट में ज्यादा जगह बनाई जानी चाहिए, क्योंकि हमें सचमुच एक मॉडर्न ब्रांड मार्केट की जरूरत है। इंश्योरेंस और पीएफ का पैसा विदेशों में लगाने का प्रस्ताव बेहतर रिटर्न के लिहाज से अच्छा है। आम लोगों को मार्केट से जोड़ने के लिए छोटी मासिक किश्तों वाली फंड स्कीमें भी जरूरी लगती हैं। बैंकों में सरकार की मिल्कियत घटाने की सिफारिश भी अगर लागू हो सके, तो फायदेमंद साबित होगी। ये सभी सिफारिशें चूंकि फाइनैंशल सेक्टर से ताल्लुक रखती हैं, इसलिए इनके साथ तकनीकी बारीकियां जुड़ी हैं, लेकिन इनकी अहमियत समझने में हमें गलती नहीं करनी चाहिए। सीधी सी बात है कि अगर भारत को दुनिया का अग्रणी देश बनना है, तो उसे वित्तीय तौर पर भी दुनिया से एकाकार होना पड़ेगा। फिलहाल हमने खुद को हजार बहानों से बांध रखा है। कुछ बंदिशें जायज हो सकती हें, जैसे रुपए की पूर्ण परिवर्तनीयता को लेकर, लेकिन आम तौर पर हम इनसे खुद का ही नुकसान कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि फाइनैंशल रिफॉर्म का मतलब है जीडीपी में दो फीसदी तक का इजाफा। जाहिर है, हम पीछे रहकर बहुत कुछ गंवा रहे हैं और गंवाए गए मौकों के लिए बदकिस्मती से किसी को कसूरवार नहीं ठहराया जाता।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स
09 अप्रैल 2008

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