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मदरसों में आधुनिक शिक्षा

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत कार्यरत राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान की मदरसों में आधुनिक शिक्षा प्रदान करने की पहल एक सही शुरुआत है। यह समय की मांग है कि मदरसों के साथ-साथ मुस्लिम समाज का धार्मिक एवं राजनीतिक नेतृत्व इस पहल को समर्थन देने के लिए आगे आए। ऐसी अपेक्षा इसलिए की जाती है, क्योंकि आज के युग में केवल धार्मिक शिक्षा से काम चलने वाला नहीं है। नि:संदेह धार्मिक शिक्षा के महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन क्या यह किसी से छिपा है कि आधुनिक विषयों के ज्ञान के बगैर किसी भी वर्ग के छात्रों के व्यक्तित्व का अपेक्षित विकास संभव नहीं। कम से कम अब तो मदरसों के संचालक इससे परिचित हो ही गए होंगे कि उनके यहां से निकले छात्रों के समक्ष अपने जीवन को संवारने के अवसर बहुत ही सीमित होते हैं। मदरसों से निकले छात्रों को शायद ही कोई ढंग की नौकरी मिल पाती हो। इस तथ्य से भी मुंह मोड़ने का कोई मतलब नहीं कि मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन और गरीबी के लिए एक हद मदरसों की शिक्षा को पर्याप्त समझा जाना है। दरअसल आज के युग में जो समाज आधुनिक शिक्षा से जितना दूर रहेगा वह आगे बढ़ने में उतना ही असफल साबित होगा। यद्यपि मदरसों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने की पहल इसके पहले भी की जा चुकी है, लेकिन वह परवान नहीं चढ़ सकी। जब भी शासन के स्तर पर ऐसी कोई पहल हुई, मुस्लिम समाज के एक वर्ग ने उसे संदेह की नजर से देखा। अनेक बार तो ऐसी किसी पहल को मदरसों और साथ-साथ मुस्लिम समाज के मामलों में अनावश्यक दखल करार दिया गया। देखना यह है कि राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान की पहल का क्या हश्र होता है? जो भी हो, यह समझने की जरूरत है कि मदरसों के संदर्भ में सच्चर समिति की सिफारिशें मुस्लिम समाज का भला करने में सहायक सिद्ध नहीं होने वालीं।
चूंकि राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान की ओर से आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए दी जाने वाली सुविधाओं से कोई शर्त नहीं जुड़ी है इसलिए उन्हें हासिल करने में गुरेज नहीं किया जाना चाहिए। क्या मुस्लिम समाज का नेतृत्व यह सुनिश्चित करेगा कि मदरसे आधुनिक शिक्षा का भी केंद्र बनें? बेहतर होगा कि दारुल उलूम जैसी संस्थाएं मदरसों को इसके लिए प्रेरित करें कि वे राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान की ओर से मुहैया कराए जाने वाली सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए आगे आएं। प्रेरणा प्रदान करने का यह कार्य उत्तार भारत में खास तौर पर होना चाहिए, क्योंकि दक्षिण के राज्यों के मुकाबले उत्तार भारत के मुस्लिम छात्र आधुनिक शिक्षा से कहीं अधिक दूर हैं। वे सामाजिक पिछड़ेपन के रूप में इसकी कीमत भी चुका रहे हैं। यह आश्चर्यजनक है कि राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान अभी तक मध्यप्रदेश में कुछ मदरसों को संबद्ध कर वहां अपना एक केंद्र ही बना सका है। आज आवश्यकता इस बात की है कि देश का प्रत्येक वह मदरसा राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान का केंद्र बने जो आधुनिक शिक्षा से अछूता है। यह ठीक है कि मौलाना-मौलवियों का एक वर्ग कंप्यूटर की उपयोगिता समझने लगा है, लेकिन अभी ऐसे मदरसों की संख्या बहुत कम है जहां के छात्र आधुनिक ज्ञान के इस माध्यम से कुछ जानने-सीखने और समझने में समर्थ हैं।
संपादकीय- जागरण
१० अप्रैल २००८

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