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एक और आयोग

सांसदों के वेतन-भत्ते आदि के निर्धारण और उस संबंध में सुझाव देने के लिए एक विशेष आयोग के गठन के प्रस्ताव का स्वागत किया जाना चाहिए। ऐसी किसी संस्था के गठन से यह संदेश जाएगा कि राजनीतिक नेतृत्व अपनी सुविधाओं में मनमाने तरीके से बढ़ोतरी नहीं कर रहा है और जनप्रतिनिधियों के वेतन-भत्ते आदि का मामला भी पारदर्शी है, जनता की नजर में है। जन प्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने हर कार्य के लिए जनता के प्रति जवाबदेह होंगे और उसे विश्वास में लेकर ही कोई कदम उठाएंगे लेकिन जिस तरह से सांसद अपने वेतन-भत्ते बढ़ा लेते हैं, उसका आम आदमी में गलत संदेश जाता रहा है। दिलचस्प बात तो यह है कि इस बढ़ोतरी पर राजनीतिक दलों में अद्भुत एकता रही है। लेफ्ट पार्टियों को छोड़कर शायद ही किसी दल ने इस पर आपत्ति जताई हो। यह वामदलों के दबाव का ही नतीजा था कि सरकार ने वर्ष 2006 में यह घोषणा की कि वह सांसदों के वेतन-भत्ते आदि के पुनर्निधारण के लिए कोई नई व्यवस्था करेगी। एक विशेष आयोग के गठन के लिए सैलरी, अलाउएंसेज एंड पेंशन्स ऑफ मेंबर्स ऑफ पार्लियामेंट एक्ट 1954 में संशोधन किया जाएगा। प्रस्तावित आयोग का अध्यक्ष समाज की किसी खास शख्सियत को बनाया जाएगा। इसके अलावा इसमें चार और सदस्य होंगे। अध्यक्ष और सदस्यों का चयन एक विशेष समिति करेगी जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति और विपक्ष के नेता होंगे। आयोग का गठन हर पांच साल पर किया जाएगा और यह सांसदों के वेतन भत्ते और दूसरी सुविधाओं के बारे में जरूरी सुझाव देगा। इससे जनता को संतोष तो होगा ही उन सांसदों की भी शिकायत दूर होगी जो अपने वेतन आदि को अपर्याप्त बताते रहे हैं। प्रस्तावित आयोग कर्मचारियों के लिए गठित आयोग की तरह ही मूल्यवृद्धि आदि दूसरे तत्वों को ध्यान में रखकर सिफारिशें करेगा। लेकिन बात फिर घूम-फिरकर वहीं आ टिकती है। यह आयोग भी दूसरी सलाहकारी संस्थाओं की तरह ही काम करेगा। सरकार की विभिन्न सलाहकारी संस्थाओं की सिफारिशों का आज क्या हश्र हो रहा है, यह भी हम देख ही रहे हैं। सिफारिशों को लेकर भी खूब राजनीतिक खेल खेला जाता है। कहीं इस प्रस्तावित संस्था का भी वही हाल न हो। असल बात नीयत की है। अगर हमारे जन प्रतिनिधि खुद की जवाबदेही समझते हुए एक तर्कपूर्ण ढंग से अपने लिए सुविधाओं की मांग करें तो जनता को शिकायत नहीं होगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि सांसदों के वेतन-भत्ते के मामले के लिए प्रस्तावित आयोग कारगर साबित होगा।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स
04 अप्रैल 2008

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