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खाद्यान्न संकट का खतरा

चिंताजनक केवल यही नहीं है कि महंगाई पर रोक लगाने के प्रयासों के बावजूद मुद्रास्फीति की दर घटने का नाम नहीं ले रही, बल्कि यह भी है कि केंद्रीय सत्ता मूल्य वृद्धि के समक्ष असहाय नजर आ रही है। केंद्र सरकार के नीति-निर्माता देश की जनता को महंगाई का मुकाबला करने में सफल रहने का भरोसा दिलाने के बजाय जिस तरह जादू की छड़ी न होने का जुमला उछाल रहे है उससे तो यही प्रकट होता है कि अब उन्हें यही नहीं समझ आ रहा कि आगे क्या किया जाए? विगत दिवस प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खाद्यान्न के मूल्यों में वृद्धि के चलते विकास की गति थमने की आशंका जता कर सच की स्वीकारोक्ति भर की है। उन्होंने यह भी माना कि महंगाई के चलते रोजगार के अवसर कम होने के साथ गरीबी उन्मूलन का अभियान भी प्रभावित हो सकता है। प्रश्न यह है कि उनकी सरकार इस जटिल स्थिति से निपटने के लिए क्या करने जा रही है? क्या सच्चाई बयान करने मात्र से समस्या का समाधान हो जाएगा? प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के महानिदेशक के इस विचार से सहमति जताई कि जैविक ईधन बनाने में खाद्यान्न का उपयोग दुनिया भर में अन्न संकट बढ़ा रहा है, लेकिन आखिर जब भारत में यह कार्य सीमित स्तर पर हो रहा है तब फिर देश में अनाज की कमी का क्या मतलब? क्या यह एक तथ्य नहीं कि कृषि और किसानों की उपेक्षा के चलते ही भारत पर्याप्त मात्रा में अन्न का उत्पादन करने में असमर्थ है? पिछले चार वर्षो में खेती और किसानों की जैसी घातक उपेक्षा की गई है उसके दुष्परिणामस्वरूप भारत वैश्विक अन्न संकट में भागीदार बना है। यद्यपि केंद्रीय सत्ता कुछ वर्ष पहले ही इससे अवगत हो गई थी कि देश में गेहूं, चावल जैसी मुख्य उपज की पैदावार भी घटती जा रही है, लेकिन पता नहीं क्यों उसने इस ओर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी? सबसे खराब बात यह रही कि वह तब भी नहीं चेती जब खुद सरकारी सर्वेक्षण यह बता रहे थे कि एक बड़ी संख्या में किसान हताश-निराश हैं और वे खेती को घाटे का सौदा मानने लगे हैं।
यदि भारत कृषि प्रधान देश होते हुए भी गेहूं, दालों, खाद्य तेल आदि का आयात करने के लिए विवश है तो इसके लिए भारत सरकार ही जिम्मेदार है। यह गनीमत है कि भारत में बड़े पैमाने पर खाद्यान्न का इस्तेमाल जैविक ईधन बनाने में नहीं किया जा रहा, अन्यथा आज महंगाई अपने भयावह रूप में होती। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की चेतावनी के बाद समझदारी इसी में है कि भारत अन्य देशों की तरह से खाद्यान्न से जैविक ईधन बनाने से बचे। वैसे भी इस नुस्खे की उपयोगिता सिद्ध होनी अभी शेष है। देखना है कि दुनिया के अन्य देश और विशेष रूप से अमेरिका, ब्राजील आदि यह साधारण सी बात समझते हैं या नहीं कि यदि लाखों टन अनाज जैविक ईधन बनाने में खपा दिया जाएगा तो फिर पेट भरने के लिए अन्न कहां से आएगा? बेहतर हो कि भारत संयुक्त राष्ट्र के मंच के जरिये खाद्यान्न को जैविक ईधन में तब्दील करने के सिलसिले के प्रति दुनिया को आगाह करे। केवल इतना ही पर्याप्त नहीं। संप्रग सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि का वास्तव में उत्थान हो। नि:संदेह यह कार्य केवल चिंता जताने या फिर किसानों के कर्ज माफ करने भर से संभव नहीं।
संपादकीय- जागरण
1२ अप्रैल २००८

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