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कुनबे की सियासत

कांग्रेस की तरफ से यह साफ कर दिया गया है कि न तो गांधी परिवार को चाटुकारिता पसंद है और न ही प्राइम मिनिस्टर का पद खाली है। लेकिन राहुल गांधी को पीएम बनाए जाने की मांग के साथ जो मुद्दे उठ खड़े हुए हैं, उनका जवाब मिलना अब भी बाकी है। सवाल कई हैं, जैसे कि यह मांग क्यों उठी, जबकि राहुल मंत्री पद लेने तक से इनकार कर चुके हैं? क्या कांग्रेस (यूपीए) को पीएम पद के लिए एक नए नाम की जरूरत है, जबकि इलेक्शन में अभी साल भर की देरी तो है ही? क्या इस मांग को मौजूदा पीएम मनमोहन सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं माना जाना चाहिए? क्या राहुल गांधी के नाम से ऐसा जादू हो जाएगा कि कांग्रेस और यूपीए की किस्मत चमक जाए? क्या यह चाटुकारिता का ही लेटेस्ट नमूना है, जिसने वंशवाद को कांग्रेस में पूरी तरह प्रतिष्ठित कर दिया है? या फिर यह कांग्रेस और यूपीए की अंदरूनी सियासत का कोई दांव है? जाहिर है, ये सवाल ऐसे हैं कि इन पर अंतहीन बहस चल सकती है। उस बहस को लेकर इस देश में उत्साह की भी कोई कमी नहीं रहने वाली। हो तो यह भी सकता है कि बहस चलाना ही किसी का मकसद रहा हो। लेकिन यह बहस कांग्रेस को एक खतरनाक मोड़ की तरफ ले जा सकती थी। चाटुकारिता बीच बाजार में अच्छी नहीं लगती। वंशवाद का आरोप शर्मिंदगी पैदा करता है। और सबसे बड़ी बात यह कि इससे सरकार के मुखिया पर छींटे पड़ते हैं, जो कि चुनावों को लेकर गरमाते माहौल में कोई अच्छी बात नहीं। इससे सरकार की इज्जत और लीडरशिप की साख आलोचना के दायरे में आ जाती है, यानी यह अपने विरोधियों की बंदूकों में खुद बारूद भर देने जैसी बात है। कांग्रेस की निगाह से यह खतरा छिपा नहीं रह सकता था, लिहाजा सीनियर नेताओं को फटकारने के अंदाज में और कुनबे में खटपट का खतरा उठाते हुए स्थिति संभालने की कोशिश की गई। यह कोशिश तकनीकी तौर पर सही थी, लेकिन सियासत का अनुभव तो यही बताता है कि राहुल गांधी के लिए लामबंदी न तो खत्म होगी और न ही उनका फैन क्लब ऐसी फटकार से ज्यादा हतोत्साहित होगा। फटकार वक्ती है, जबकि युवराज के मनोनयन के लिए मौन सहमति हमेशा रहती है। कांग्रेस कुल मिलाकर कांग्रेस ही रहेगी और अपनी संस्कृति से बाहर नहीं निकलेगी, हालांकि इसे लेकर सवाल भी उसका पीछा नहीं छोड़ेंगे। हम समझते हैं कि कांग्रेस को अपना नजरिया वाकई उदार बनाना चाहिए। उसे अपने भीतर लीडरशिप के सवाल को खुला रखने का साहस जुटाना चाहिए। हो सकता है कि नेतृत्व की विविधता उसे बेहतर और ताकतवर पार्टी बनाए। देश की सबसे बड़ी पार्टी खुद वंशवाद के आरोप से घिरे रहे, यह गर्व करने की बात तो नहीं। फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस तरह का आत्मघाती माहौल रचने के बजाय कांग्रेस के नेता पार्टी को मजबूत बनाने के सूत्र क्यों नहीं सुझाते? यूपी-बिहार में कांग्रेस को मजबूत करने की कवायद राहुल गांधी के रोड शोज से आगे क्यों नहीं बढ़ी? सारा माजरा क्या कहता है? सूत न कपास, जुलाहों में लठ्ठमलठ्ठ।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स

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