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तिब्बत और भारत

भारत सरकार ने चीन के इस अनुरोध को ठुकरा कर बिलकुल सही किया कि ओलंपिक मशाल के आगमन पर दिल्ली में तिब्बतियों के विरोध प्रदर्शन पर रोक लगा दी जाए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति संवेदनशील और लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के नाते भारत के लिए ऐसे किसी सुझाव पर ध्यान देने का कोई औचित्य ही नहीं। यह आश्चर्यजनक है कि भारत सरकार ने तो तिब्बतियों को लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज कराने की अनुमति दी, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार ने ठीक इसके विपरीत कार्य किया। उसने तिब्बतियों को कोलकाता में रैली करने की इजाजत देने से इनकार कर दिया। क्या पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने लिए शेष देश से अलग नियम बना रखे हैं? यदि नहीं तो इस शर्मनाक चीनपरस्ती का क्या मतलब? पश्चिम बंगाल सरकार ने कुछ दिनों पहले जिस तरह तिब्बतियों को जुलूस निकालने की अनुमति दी और फिर उन्हें रैली करने से रोक दिया उससे यह साफ हो गया कि उसने चीन को खुश करने के लिए ऐसा किया। यह इससे भी जाहिर होता है कि पश्चिम बंगाल सरकार के इस रवैये की चीनी दूत ने खासी सराहना की। यह ठीक नहीं कि वामपंथी राजनेता अब यह संकेत देने में संकोच नहीं करते कि उनके प्राण तो चीन में ही बसते हैं? वामपंथियों का ऐसा व्यवहार इस धारणा को बल प्रदान करता है कि उन्हें राष्ट्र हित से अधिक चीन के हितों की परवाह है। वैसे तो वामपंथियों का चीन प्रेम जग जाहिर है, लेकिन क्या अब वे एक देश में दो नियम चाहते हैं? अच्छा हो कि भारत सरकार यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में विदेश नीति से संबंधित मामलों में केंद्र और राज्य अपना-अपना राग अलापते न नजर आएं, क्योंकि ऐसा होने का अर्थ है अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की जगहंसाई।
तिब्बत का मसला जिस तरह दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया है उसे देखते हुए भारत के लिए केवल यही पर्याप्त नहीं कि वह चीन के दबाव में आने से बचे। आवश्यक यह भी है कि वह तिब्बत की स्वायत्तता के पक्ष में अपने रवैये पर दृढ़ रहे। यह इसलिए और भी जरूरी है, क्योंकि चीन तिब्बत में मानवाधिकारों का निर्ममता से दमन करने में लगा हुआ है। यदि हमारे देश में सबसे ज्यादा तिब्बती शरणार्थी रह रहे हैं तो उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की चिंता करते दिखना भारत सरकार का नैतिक दायित्व है। इस दायित्व की पूर्ति करते समय चीन से मैत्री संबंधों का ध्यान रखने के साथ ही एक जिम्मेदार राष्ट्र की तरह से व्यवहार करना भी आवश्यक है। यह सही है कि खेलों और विशेष रूप से ओलंपिक को राजनीति से दूर रखना चाहिए, लेकिन यदि ऐसा नहीं हो पा रहा तो इसके लिए चीन ही जिम्मेदार है। वह तिब्बत के मामले में सच्चाई बयान करने के बजाय दुष्प्रचार का सहारा लेने के साथ ही दलाई लामा को बदनाम भी कर रहा है। आज यदि ओलंपिक मशाल की यात्रा विवादों से घिर गई है तो वे प्रमुख देश भी दोषी हैं जिन्होंने चीन के अलोकतांत्रिक स्वरूप से परिचित होने के बाद भी उसे ओलंपिक की मेजबानी सौंपी। चूंकि ओलंपिक का चीन से बस इतना ही नाता है कि वे इस बार वहां हो रहे है इसलिए तिब्बतियों और उनके समर्थकों के लिए यह जरूरी है कि वे अपने विरोध प्रदर्शन को हिंसा से मुक्त रखें। यदि ओलंपिक मशाल की यात्रा में बाधा डाली जाती है तो इससे कुल मिलाकर चीन को दुष्प्रचार करने का ही मौका मिलेगा और यह तिब्बत के हित में नहीं होगा।
संपादकीय- जागरण

1 comment:

rakhshanda said...

Sarkar ne China ke sath Tibbat mudde par sahi kadam uthaya.Kaash aisi hi himmat ham Iran muddey par America ke sath dikhate,par kya karen ham majboor jo thahre...