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नेपाल में बनते नए समीकरण

लोकतांत्रिक चुनावों की अपनी तमाम खूबियां होती हैं और उनमें से एक है उसके अप्रत्याशित नतीजे। दुनिया भर में जहां भी लोकतांत्रिक तरीकों से लोगों ने अपनी सरकार बनाने का विकल्प चुना है, वहां कभी न कभी ऐसा जरूर हुआ है कि इस प्रक्रिया के नतीजों पर उन्हीं लोगों को भी उतना ही आश्चर्य हुआ, जितना अन्य पर्यवेक्षकों को। कुछ ऐसा ही हुआ है हमारे पड़ोसी देश नेपाल में, जहां एक ऐतिहासिक चुनाव में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)ने अप्रत्याशित सफलता हासिल की है। अब इसमें बहुत संशय नहीं कि नेपाल की सदियों पुरानी राजशाही का अंत निकट है और वहां की अगली लोकतांत्रिक सरकार में माओवादियों का प्रभुत्व रहेगा। चुनाव के नतीजों में नेपाली कांग्रेस के अलावा अन्य छोटे दलों, जिसमें मधेशियों के प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां शामिल थीं, का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा। भारत में इन नतीजों पर अभी आधिकारिक तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। ऐसा लगता है कि नेपाल के घटनाक्रम पर जिस तरह से भारत ने निष्क्रियता के भाव दिखाए थे, उसके चलते भारतीय विदेश नीति के निर्धारकों ने ये मान लिया था कि वहां जो कुछ भी होगा उससे भारत को कोई लेना-देना नहीं है और अंत में नेपाल रहेगा, तो भारत का छोटा भाई। पर अब नए परिप्रेक्ष्य में यह नहीं कहा जा सकता कि अगली सरकार का रुख भारत के प्रति वही रहेगा, जो पिछली राजशाही और नेपाल कांग्रेस का रहता था। माओवादी नेता प्रचंड नेपाल में भारत विरोधी भावनाओं के बल पर ही वहां के आम आदमी का विश्वास जीतने में सफल रहे हैं। आज प्रचंड यह जरूर कह रहे हैं कि उनकी सरकार बनने की दशा में वे भारत और चीन के साथ अच्छे संबंध बनाने के पक्षधर हैं। पर भारत और नेपाल के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा का लगभग न होना, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समानताएं, बेरोकटोक आवागमन और सदियों पुराना लगाव दोनों देशों के संबंधों को एक ऐसी परिभाषा देता है जो और किसी देश के साथ नहीं है। दूसरी ओर भारत के कई राज्यों में नक्सलवाद और माओवादी अशांति की आग फैलाते जा रहे हैं। नेपाल में माओवादी सरकार बन जाने के बाद लाल गलियारे से नेपाल का जुड़ा होना एक बिलकुल नई स्थिति को पैदा कर सकता है, जिसके लिए हमारे नीति निर्धारकों को तैयार रहना चाहिए। पड़ोसी राज्यों में लोकतंत्र की बयार बहना एक शुभ संकेत है, लेकिन अपने देश की आंतरिक और सीमा सुरक्षा के लिए हमारी तैयारी का भी कोई विकल्प नहीं है। इस दिशा में अब समझदारी से काम लेने की जरूरत है।
संपादकीय- भास्कर

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