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आपसी सहमति की महत्ता

  • एक अप्रैल से दर्पण पर भास्कर, जागरणा व नवभारत टाइम्स के मुख्य संपादकीय का एक साथ अध्ययन करें
‘कानून की तकनीकियों में उलझे बगैर कोर्ट सामान्य समझ से काम ले और संबंधित पक्षों को आपसी सहमति की अनुमति दे’- सुप्रीम कोर्ट की यह सलाह अदालतों में लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने की दिशा में नेक तो है, लेकिन नाकाफी भी। अदालतों में लंबित मुकदमंलभ और शीघ्र न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा हैं जिससे लोकतंत्र का यह महत्वपूर्ण स्तंभ अपनी सार्थकता स्थापित नहीं कर पा रहा है।
न्यायपालिका की भूमिका न्यायपूर्ण समाज व्यवस्था के निर्माण में अग्रणी मानी जा सकती है। यह संस्था सामाजिक परिवर्तन का वाहक भी बनती है। विसंगति यह है कि मामले सिविल हों या क्रिमिनल, बरसों तक फैसले के लिए लटके रहते हैं। इसके चलते जहां आम आदमी को न्याय के लिए भटकना पड़ता है, वहीं शासन और सामाजिक व्यवस्था की खामियों को दूर करने में भी लंबा वक्त लग जाता है। इस समस्या के प्रति पिछले दिनों राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने भी अपनी चिंता जाहिर की थी।
सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न न्यायाधीशों द्वारा समय-समय पर ऐसे निर्देश दिए गए हैं, जिससे शीघ्र न्याय मिल सके, लेकिन ये सभी नाकाफी ही साबित ही हुए हैं। कभी जांच एजेंसियों की लापरवाही, तो कभी सरकारी तंत्र का असहयोग, कभी न्यायाधीशों की कमी तो कभी अन्य कारणों से अदालतों का बोझ बढ़ता ही जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की ताजा सलाह इस समस्या को हल करने की दिशा में एक और कदम है, लेकिन इन छोटे-छोटे कदमों से लंबित प्रकरणों की विकरालता कम होती नजर नहीं आती।
जरूरत इस बात की है कि इस समस्या पर समग्र रूप से विचार किया जाए तथा सभी संबंधित पक्षों को मिलकर कोई ऐसी रणनीति ईजाद करनी होगी, जो न्यायिक व्यवस्था की जरूरतों और खामियों को दूर करते हुए पूरक संस्थाओं को भी सक्षम बनाए। इसमें अधिवक्ताओं की भूमिका और सहयोग को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था व शासन-प्रशासन में व्याप्त उन विसंगतियों को दूर करना भी जरूरी है, जो न्याय की गुहार में लोगों को अदालतों तक ले जाती है। एक न्यायपूर्ण व्यवस्था लोकतंत्र की सफलता और मजबूती की अनिवार्य शर्त है। इस लक्ष्य को पाने के लिए शिकवा-शिकायत या छोटे उपायों की बजाय समेकित प्रयास की जरूरत है। चिंता व्यक्त करते काफी वक्त निकल गया। अब इस दिशा में ठोस पहल करना अनिवार्य हो चला है।
संपादकीय-भास्कर

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