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नई राह पर नेपाल

नेपाल में माओवादियों का विजय अभियान जिस तरह जारी है उससे उनका निर्णायक ताकत के रूप में उभरना तय है। संविधान सभा के लिए हुए चुनावों में माओवादियों का सबसे आगे रहना अप्रत्याशित अवश्य है, लेकिन उनकी सफलता यह स्पष्ट करती है कि मुख्यधारा के राजनीतिक दल और विशेष रूप से नेपाली कांग्रेस आम जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी। इसके लिए अन्य किसी को दोष नहीं दिया जा सकता। मुख्यधारा के राजनीतिक दल जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप कार्य करने के स्थान पर जिस तरह गुटबाजी में उलझे रहे उसे देखते हुए उनके हश्र पर आश्चर्य नहीं। यद्यपि अभी पूरे चुनाव परिणाम सामने आना शेष हैं, लेकिन माओवादियों की बढ़त के बाद दुनिया भर की निगाहें उन्हीं पर केंद्रित होना स्वाभाविक है। वैसे तो प्रचंड के नाम से विख्यात और साथ ही कुख्यात सीपीएन माओवादी दल के नेता पुष्प कमल दहल ने गठबंधन सरकार बनाने के संकेत दिए हैं और नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी व्यक्त की है, लेकिन उनके इरादों को लेकर संदेह बरकरार रहना स्वाभाविक है। इन संदेहों का कारण उनका अतीत है। माओवादी चाहते तो न जाने कब लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बन सकते थे, लेकिन ऐसा करने के बजाय उन्होंने सशस्त्र संघर्ष छेड़ा और फिर हिंसा और हत्याओं को जायज ठहराने के बाद लोकतंत्र के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया। क्या ऐसे हिंसाप्रेमी तत्व लोकतंत्र के प्रति वास्तव में प्रतिबद्ध रह सकेंगे? दरअसल यह वह सवाल है जिसका सवाल भविष्य के गर्भ में निहित है।
नेपाल के चुनावों से केवल ढाई सौ वर्ष पुरानी राजशाही के अंत पर मुहर ही नहीं लगी, बल्कि दुनिया के नक्शे से एक मात्र हिंदू राष्ट्र भी विदा हो गया। यदि इस देश मेंराजशाही प्रतीकात्मक रूप से भी अपना अस्तित्व नहीं बनाए रख सकी तो इसके लिए नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र जिम्मेदार हैं, जिन्होंने अपने आचरण से अपनी लोकप्रियता खत्म की। नेपाल के घटनाक्रम पर भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया कुछ भी हो, लेकिन यह सहज ही समझा जा सकता है कि विदेश नीति के नियंताओं के माथे पर चिंता की लकीरें उभर रही होंगी। भले ही माओवादी नेता भारत के साथ अपने संबंधों को लेकर राजनीतिक रूप से उपयुक्त बयान दे रहे हों, लेकिन माओवादियों के वर्चस्व वाला नेपाल भारत विरोधी रुख अपना सकता है। वह उस सकारात्मक दबाव से भी मुक्त हो सकता है जो अभी तक भारत कुछ अन्य देशों और विशेष रूप से अमेरिका के साथ मिलकर उस पर डालने में सक्षम था। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि भारत के नक्सली संगठन जो वस्तुत: माओवादियों के भाई-बंधु ही हैं, और अधिक दुस्साहसी हो सकते हैं। वैसे भी वे इस दर्शन पर यकीन करते हैं कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। भारत सरकार को इसके प्रति सतर्क रहना होगा कि नक्सली संगठन नेपाल के माओवादियों से दुष्प्रेरित न होने पाएं। भारत को नेपाल में भावी सरकार के गठन के साथ ही उस सरकार की ओर से रचे जाने वाले संविधान पर भी निगाह रखनी होगी। यह ठीक है कि नेपाल एक नई राह पर चलने को तैयार है, लेकिन फिलहाल इसे लेकर सिर्फ अनुमान ही लगाए जा सकते हैं कि यह राह दोनों देशों के संबंधों को किस स्तर पर ले जाएगी?
संपादकीय- जागरण

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