Monday

नाचत हे बब्बर शेर, हो माता

  • राजकुमार सोनी

नवरात्रि शुरू हो गई है। अब इसे माता का डर कहें या कुछ और लेकिन यह हकीकत है कि आदिशक्ति-मातृशक्ति के कुछ उपासक नौ दिनों तक दारू के ठिकानों पर नहीं जाएंगे। गणेश उत्सव के दौरान इश्क कमीना-निकम्मा जैसे जिन गानों को बड़ी आसानी से सुना जा सकता है इन दिनों में वे ऐसे गानों को भी सुनना पंसद नहीं करेंगे। माता का त्रिशूल सचमुच में बहुत नुकीला होता है। बहुत से भक्तों का अमरदीप टाकीज की तरफ से गुजरना भी नहीं होगा क्योंकि यही वह इलाका है जहां से रान-वान, कलेजी-चाप के अलावा दिमागी बीमारी को कुछ घंटों तक ठीक करने वाली नीली फिल्म की टिकट खरीदी जा सकती है। सवाल यह नहीं है कि किसने माता की सेवा में नौ दिन बिताए और किसने पांच मिनट की पूजा अर्चना में जीवन सुधार लिया? पूजा और आस्था का मसला निहायत ही निजी मसला माना जाता है इसलिए हर मनुष्य के इस निजीपन का जिसमें वह बड़े आदर तथा मनोयोग के साथ सार्वजनिक होते हुए शांति की तलाश कर लेता है, सम्मान किया जाना चाहिए। पूजा और आस्था के इन्हीं क्षणों के बीच शहर में एक लड़की को निर्वस्त्र दौड़ाने की घटना मन को कचोटती है। अब से कुछ दिनों बाद हममें से बहुत से लोगों का पंचमी में मां बम्लेश्वरी के दर्शन के लिए डोगरगढ़ जाना होगा। कुछ अष्टमी के हवन कार्यक्रम में शामिल होंगे। क्या इस दौरान वह लड़की जिसके कपड़े फाड़ दिए गए थे जेल से बाहर आ जाएंगी? एक अप्रैल की रात जो लड़की शहर में बिना कपड़ों के दौडऩे के लिए मजबूर हुई उसे अपने दुधमुंहे बच्चे के साथ जेल गए एक सप्ताह हो गए हैं। एक सप्ताह में उसके साथ बदसलूकी करने वाले सारे शरीफजादे जमानत पर रिहा हो गए हैं लेकिन लड़की जेल से नहीं निकल पाई है। बताते हैं कि एक होटल में लोगों के झूठे बर्तन धोकर जैसे-तैसे परिवार की गाड़ी खींचने वाले उसके भाई ने जमानत के लिए एक पट्टेदार की व्यवस्था भी की थी लेकिन लड़की ने कह दिया पहले भाभी (पुलिस ने झूठे आरोपों में लड़की की भाभी को भी जेल जाने के लिए मजबूर कर दिया था) को छुड़वा लो। लड़की की जमानत लेने के लिए कोई भी सामने नहीं आ रहा हैं क्योंकि सभ्य समाज को यह भय है कि पुलिस टंटा न खड़ा कर दे। यह न समङा लिया जाए कि हम भी ऐसे-वैसे ही है। लड़की को पुलिस के बताए अनुसार वेश्यावृति करती है लिख-लिखकर इतना अधिक बदनाम कर दिया गया है कि...अब बस हद ही हो गई है जैसे शब्दों का इस्तेमाल ही बाकी रह गया है। अंतिम सत्य के तौर पर यह बात नहीं लिखी जा रही है लेकिन यह वास्तविकता है कि सबसे मजबूर-कमजोर निरीह गरीब प्राणी किसी की भी सूची का हिस्सा नहीं बन पाता है। न तो ताकतवर और पैसे वालों के पास उसके लिए सहानुभूति होती है और न ही सरकार उसकी बेहतरी के लिए कुछ कर पाती है। रेडीमेंट कपड़ों के खतरनाक युग में हर किसी को निरूपा राय समङाकर सिलाई मशीन थमा देना और इज्जत के साथ दो रुपए कमा लेने की सलाह देने की बात क्या पूरी तरह सही है? अनैतिक धंधों में लिप्त लड़कियों के पुर्नवास के मामले में सरकार उषा सिलाई मशीन से आगे नहीं बढ़ पाई है। यदि लड़की सही मायनों में धंधा कर रही होती तो उसके पास इतने पैसे तो जरूर होते ही कि वह अपने लिए जमानतदार खोज सके। यह किसी से छिपा नहीं है थोड़ा सा पैसा फेंकने पर कोर्ट में ही जमानतदार मिल जाते हैं। लड़की को जमानतदार नहीं मिल पाए अलबत्ता जो कुछ उसके साथ हुआ उसके विरोध में धरना-प्रदर्शन और मटका फोडऩे का सिलसिला अब भी जारी है। कभी इस शहर में मुजरा होता था। शहर की बेहद नामी-गिरामी हस्तियां मुजरा सुनने जाया करती थीं। बताते हैं कि मुजरा करने वाली महिलाएं रहमानियां चौक में दुर्गा उत्सव मनाया करती थीं। इस उत्सव में शहर के सेठ जी खोलकर मदद दिया करते थे। शायद अब वैसे सेठ बचे नहीं जो मदद को पुण्य का एक हिस्सा मानते थे। अब शायह मदद का मतलब स्वार्थ ही रह गया है। क्या वास्तव में लड़की को मदद करने वाले मसले ने पाप की मैली चादर ओढ़ ली है? आज से यह गाना हर जगह बजेगा-नाचत है बब्बर शेर हो माता.... एक मजबूर लड़की की मदद किए बगैर क्या हम इस शहर में शेरों का झूमना देख पाएंगे

लेखक हरिभूमि रायपुर में सिटी के प्रभारी हैं

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