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सिफारिशों में संशोधन

छठे वेतन आयोग की रपट की जांच-परख के लिए कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन यह संकेत देता है कि केंद्र सरकार विभिन्न कर्मचारी संगठनों की आपत्तियों पर गौर करने के लिए तैयार है। आईपीएस, आईएफएस, आईआईएस और सैन्य अधिकारियों समेत केंद्रीय कर्मचारियों के विभिन्न संगठनों की नाराजगी देखते हुए इस पर विचार करना उचित ही है कि कहीं वेतन आयोग की अनुशंसाओं में विसंगतियां तो नहीं? यह विचित्र है कि तमाम आपत्तियों से अवगत होने के बावजूद वेतन आयोग अपनी सिफारिशों में तनिक भी फेरबदल के लिए सहमत नहीं। वेतन आयोग अपनी सिफारिशों को लेकर जिस तरह दृढ़ नजर आ रहा है उससे तो यह लगता है जैसे उसने अंतिम सत्य का निर्धारण कर दिया है। क्या वास्तव में ऐसा है? यदि उसकी सिफारिशें इतनी ही नीर-क्षीर हैं तो फिर उनसे कोई भी सहमत क्यों नहीं दिखता? क्या कारण है कि केंद्रीय कर्मचारियों के अनेक संगठनों के साथ-साथ रक्षामंत्री एके एंटनी और रेलमंत्री लालू यादव भी वेतन आयोग की सिफारिशों में बदलाव के इच्छुक हैं? इस संदर्भ में इन दोनों मंत्रियों द्वारा प्रधानमंत्री से अपनी चिंता व्यक्त करना सामान्य बात नहीं। यह भी सामान्य घटनाक्रम नहीं कि आईपीएस सेवा के अधिकारियों ने अपना दु:खड़ा सोनिया गांधी के समक्ष रोया। जहां वेतन आयोग की सिफारिशों के संदर्भ में आईपीएस अधिकारियों की मांग का अनेक राजनेताओं ने समर्थन किया है वहीं भारतीय सूचना सेवा के अधिकारियों ने इन सिफारिशों को तथ्यात्मक रूप से गलत ठहराया है। क्या इस सबकी अनदेखी कर दी जाए? इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या सेना के जवानों की निराशा को दूर करने की कोशिश न की जाए? वेतन आयोग को इससे अवगत होना ही चाहिए कि उसकी सिफारिशें सामने आते ही एक बड़ी संख्या में सैन्य अधिकारियों ने नौकरी छोड़ने की इच्छा व्यक्त की है।
नि:संदेह कोई भी वेतन आयोग सभी कर्मचारियों को संतुष्ट नहीं कर सकता, लेकिन आखिर ऐसी सिफारिशें किस काम की जिनसे कोई खुश ही न नजर आए? फिलहाल इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति इस पर गौर करेगी या नहीं कि वेतन आयोग ने आईएएस अधिकारियों का कुछ ज्यादा ही ख्याल रखा है, लेकिन बेहतरी इसी में है कि किसी भी संवर्ग के अधिकारियों को अति विशिष्ट दर्जा देने से बचा जाए। आखिर आईएएस अधिकारियों की तुलना में आईपीएस, आईएफएस आदि सेवा के अधिकारियों को दोयम दर्जे पर रखने का क्या औचित्य? विभिन्न संवर्गो के बीच जानबूझकर भेदभाव करने का मतलब है प्रशासनिक तंत्र के एक बड़े वर्ग को कुंठा से भर देना। इससे न तो सरकार का हित होने वाला है और न ही समाज का। अब जब यह उम्मीद बंध रही है कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति वेतन आयोग की सिफारिशों में कुछ न कुछ संशोधन करेगी तब यह आवश्यक हो जाता है कि अधिकारियों और कर्मचारियों की नाराजगी दूर करने के साथ ही इस पर भी ध्यान दिया जाए कि वे कैसे कार्यकुशल और जवाबदेह बनें? यदि संशोधित सिफारिशें आ जाती है और सरकारी कामकाज का ढर्रा जस का तस बना रहता है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण ही होगा।
संपादकीय- जागरण

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