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देशहित में नहीं मुफ्ती की सलाह

केंद्र में गृहमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर रह चुके मुफ्ती मोहम्मद सईद को पता होगा कि भारतीय गणराज्य में केंद्र व राज्यों के अधिकार और भूमिकाएं क्या हैं। जम्मू-कश्मीर राज्य को धारा 370 के तहत कुछ विशेष सहूलियतें जरूर प्राप्त हैं, लेकिन मनचाही मुद्रा चलाने का अधिकार दूसरे राज्यों की तरह उसे भी नहीं है।
फिर भी मुफ्ती साहब यह सलाह देते घूम रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर में भारत-पाकिस्तान दोनों देशों की मुद्राएं चलाई जानी चाहिए। मुफ्ती चूंकि राज्य के सत्ता-संचालन में भागीदार हैं, इसलिए सार्वजनिक रूप से दिए जाने वाले उनके वक्तव्य का राजनीतिक ही नहीं, कूटनीतिक महत्व भी बढ़ जाता है। अभी कुछ दिन पहले राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस-पीडीपी गठबंधन सरकार के वित्तमंत्री जम्मू-कश्मीर के लिए अलग से अपनी मुद्रा चलाने का सुझाव देकर गंभीर विवाद को जन्म दे चुके हैं।
इसके ठीक बाद पीडीपी के संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद सईद का भी इसी से मिलता-जुलता बयान आना एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा माना जाएगा। मुफ्ती की बेटी और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती भी पाकिस्तान के पत्रकार सम्मेलन में जम्मू-कश्मीर को भारत-पाकिस्तान द्वारा संयुक्त रूप से नियंत्रित करने और इसके लिए साझा क्षेत्रीय परिषद बनाने का विवादास्पद प्रस्ताव कर चुकी हैं।
आतंकवाद और अलगाववाद से त्रस्त जम्मू-कश्मीर के लोकतांत्रिक नेता भी यदि अलगाववादियों जैसी बातें करने लगेंगे, तो इसे दुर्भाग्य ही माना जाएगा। इस्लामी जेहादियों का सिर्फ एक ही घोषित मकसद है-जम्मू-कश्मीर को भारत के कथित चंगुल से आजाद कराना। इसके लिए सीमापार से आतंकवादी घुसपैठियों का हुजूम लगातार यहां आता रहा है और जम्मू-कश्मीर के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में भी आतंक फैलता रहा है।
ऐसी स्थिति में समझा जा सकता है कि दोनों कश्मीर के लिए ‘फ्री ट्रेड’ और निर्बाध आवाजाही का रणनीतिक लाभ किसको मिलेगा! श्रीनगर और मुजफ्फराबाद की जमीनी हकीकत न तो सार्क संगठन जैसी है और न ही यूरोपीय संघ जैसी। फिर उसके जैसे मॉडल यहां लागू करने की दलील देने का तुक समझ में नहीं आता है? क्षेत्रीय पार्टियों और उसके नेताओं का यह स्वाभाविक संकट होता है कि वे अक्सर राष्ट्रीय हितों की अनदेखी कर जाते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं किसी को देश के संविधान और सीमाई संप्रभुत्ता के विरुद्ध बयानबाजी की छूट दी जा सकती है।
संपादकीय-भास्कर

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