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विडंबनाओं की मशाल

आजादी की मशाल के सामने ओलिंपिक खेलों की मशाल फीकी पड़ गई। भारत के लिए तो यह चुनौतियों की मशाल ही साबित हुई। तिब्बती प्रदर्शनकारियों और ओलिंपिक मशाल की सुरक्षा के बीच संतुलन बैठाने के चक्कर में नई दिल्ली को पसीने छूट गए। 2008 के बीजिंग ओलिंपिक का उत्सव भारत के लिए रस्म अदायगी से ज्यादा नहीं साबित हुआ।
महज दो किलोमीटर की अति सुरक्षित दौड़ ओलिंपिक खेलों के संदर्भ में एक मजाक लगती है। उस पर भी इसमें दौड़ने वाले खिलाड़ी और अन्य लोग अंतिम क्षण तक अपने को इस आयोजन से अलग करने में ही व्यस्त रहे। सुरक्षा कर्मियों और मीडिया कर्मियों के अलावा कोई साधारण दर्शक इस ऐतिहासिक और महान आयोजन का गवाह नहीं बन सका। राजधानीवासी यह सवाल पूछते ही रह गए कि जब इसी तरह सबसे छिप-छिपाकर सबकुछ करना था, तो ओलिंपिक मशाल को भारत लाने की जरूरत ही क्या थी?
चीन ने बड़े सुनियोजित ढंग से अपने ओलिंपिक आयोजन के अवसर को डिजाइन किया था। पूरी दुनिया में मशाल दौड़ के जरिए वह अपने शौर्य, सामथ्र्य और समृद्धि का जो प्रदर्शन करना चाहता था वह तिब्बत मुद्दे के पुनर्जीवन में तब्दील होकर रह गया। ‘सौहार्द की मशाल यात्रा’ प्रतिरोध और प्रतिकार की यात्रा बनकर रह गई।
तिब्बत का मुद्दा जितना प्रचारित और प्रासंगिक आज लग रहा है, उतना तो यह उस समय भी नहीं लग रहा था जब चीन ने अपनी लाल सेना के जरिए इसका अधिग्रहण किया था। इस अर्थ में यह अवसर निर्वासित तिब्बतियों के लिए नैतिक विजय का अवसर सिद्ध हुआ। भारत सरकार इस बात पर संतोष कर सकती है कि उसने बिना अपनी लाठी तोड़े सांप को मर जाने दिया। मतलब यह कि महत्वपूर्ण और जिम्मेदार देश होने के नाते उसने अपने यहां मशाल दौड़ भी करवा दी और लोकतांत्रिक देश होने के नाते तिब्बतियों के प्रदर्शन करने के जनवादी अधिकार का सम्मान भी बना रहने दिया।
इस कठिन संतुलन के माध्यम से भारत ने बेशक अपनी नैतिक-भौतिक जिम्मेदारियों से मुक्ति पा ली हो, पर चीन की मुसीबतें ओलिंपिक खेलों के बीजिंग में संपन्न होने तक बनी रहेंगी। लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी बात यह है कि मास्को ओलिंपिक और लांस एंजेल्स ओलिंपिक से खेलों के इस महाकुंभ की जो विडंबनात्मक नियति सामने आई वह बीजिंग ओलिंपिक के साथ और घनीभूत हो गई।
संपादकीय-भास्कर

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