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प्रतिभा पर पसरता अपराध

  • सौरभ तिवारी

'इंजीनियरिंग कालेज के छात्र ने ली थी हत्या की सुपारी, 'बैंक डकैती का मास्टरमाइंड निकला एमबीए का छात्र, 'पैसों के लिए इंजीनियरिंग कालेज के छात्र-छात्रा ने कर दी महिला की हत्या, 'नकली सीडी कारोबार का भंडाफोड़- कम्प्यूटर साइंस का छात्र निकला सरगना, 'अंतरराज्यीय वाहन चोर गिरोह पकड़ाया- मेडिकल कालेज के छात्र करते थे चोरी...... ये उन तमाम खबरों के शीर्षक हैं जो आए दिन समाचार पत्रों की सुर्खियां बनते हैं। ऐसे गंभीर अपराध जिनके पीछे अब तक शातिर पेशेवर अपराधियों का हाथ रहता था उनमें इन युवाओं की संलिप्तता अचंभित करते हुए कई सवाल खड़े करती है। अपराध जगत से जुड़े इन युवाओं का संबंध ऐसे शैक्षणिक संस्थानों से है जो करियर की दृष्टि से किसी भी महत्वाकांक्षी युवा का सपना होते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि करियर के इस मुकाम के मोड़ पर अपराध की अंधी गली में मुड़ जाने के पीछे आखिर क्या वजह हो सकती है? इस सवाल की पड़ताल में ही युवा मन की मनोवैज्ञानिक गुत्थी और द्वंद्व को समझा जा सकता है। इस 'गुत्थी में उलङा है युवाओं की नाजायज हसरतें और 'द्वंद्व में फंसी हैं उन हसरतों को पूरा करने की नापाक कोशिशें। यह आश्चर्य का विषय है कि अपराध जगत से जुड़ गए इन प्रतिभाशाली युवाओं का संबंध इंजीनियरिंग, एमबीए, मेडिकल आदि उन संस्थानों से है जिन्हें उज्ज्वल भविष्य की गारंटी माना जाता है। और ऐसे में जबकि सामने एक सुनहरा भविष्य बाहें फैलाए खड़ा है, अपराध को गले लगा लेना रहस्यमय लगता है। जुर्म जगत से जुड़े इन युवाओं की काबिलियत पर शंका ही नहीं की जा सकती। उच्च शैक्षिणिक पृष्ठभूमि वाले ये वे छात्र हैं जो कड़ी मेहनत और जतन के बाद प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं में सफल होकर संस्थान में प्रवेश लेते हैं। अच्छा करियर बनाने की चाह लिए जब ऐसे युवा अपने गौरवशाली अतीत के साथ इन संस्थानों में पहुंचते हैं तो उनके सामने संभावनाओं से भरा भविष्य होता है। लेकिन वर्तमान के साथ सही तालमेल नहीं बैठा पाने की परिणति उन्हें परिस्थितिजन्य हादसों के गर्त में ढकेल देती है। बाजारवाद के इस दौर ने युवाओं की जरूरतों को बढ़ाया है। ब्रांडेड कपड़े, धूममार्का बाईक, दूसरों से हटकर स्टाइलिस्ट मोबाइल, मैकडोनल्ड मार्का रेस्टोरेंटों में खाने-पीने की चाह आदि वे तमाम पहलु हैं जो उनकी जरूरतों का विस्तार कर उनके जेब खर्च को बढ़ाते हैं। इन जरूरतों को पूरा करना जाहिर तौर पर उस बजट से काम नहीं चलता जो उन्हें उनकी पढ़ाई-लिखाई और जीवनयापन के लिए घरवालों से मिलता है। संबंधों के इस उदारयुग में जबकि अफेयर चलना प्रगतिशीलता की कसौटी बन बैठा है तो महिला मित्र का होना भी नई जरूरत बनकर उभरा है। महिला मित्र साथ में नए खर्च भी लेकर आती है। और ऐसे में खुद की बढ़ी जरूरतों में जब महिला मित्र के साथ संबंध निभाने से जुड़ी अतिरिक्त जरूरत भी समाहित हो जाती है तो बजट और भी बढ़ जाता है। लिहाजा 'मैं जो चाहता हूं पाकर ही रहता हूं की जिद के साथ शुभ लक्ष्यों को हासिल करने वाले उसी युवा का लक्ष्य अब कुछ गड़बड़ा सा जाता है। स्वाभाविक तौर पर जब साध्य बदलता है तो तदनुरूप साधन भी बदल जाता है। हासिल करने की जिद का जुनून तो वही रहता है किन्तु लक्ष्य बदल चुका होता है। खतरनाक परिणाम यह होता है कि नाजायज जरूरतों को पूरा करने वही युवा अपराध के रास्ते पर चल पड़ता है। मनोचिकित्सक डा। एनके अवस्थी मानते हैं कि इस परिस्थिति के पीछे एक बड़ी वजह युवाओं को सही समय पर सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाना है। कोई यूं ही अपराध नहीं करता, उसके पीछे कुछ मजबूरी होती है। उनका मानना है कि जब जरूरतें सीधे तौर पर पूरी होती नजर नहीं आती तब मस्तिष्क उन्हें पूरा करने के लिए सभी विकल्पों पर विचार करना शुरू कर देता है। विकल्पों में नाजायज तरीके भी विचार के तौर पर उभरते हैं। यहीं से मन में उधेड़बुन शुरू होती है और एक क्षण ऐसा आता है जब मस्तिष्क उस विकल्प पर अमल करने को राजी हो जाता है। यही वह समय होता है जब उसे सही मार्गदर्शन मिल जाए तो बात बिगडऩे से बच सकती है। प्रतिभाशाली युवाओं का अपराध जगत से जुड़ाव के पीछे 'माहौल एक बड़ी वजह बनता है। चरित्र निर्धारण और परिवर्तन में माहौल की काफी भूमिका रहती है। कालेज और छात्रावास कैम्पस में सुसंगठित अपराध जगत की रुचि सदैव से रही है। फरारी काटने छात्रावास सुरक्षित स्थान के रूप में उपयोग किए जाते हैं। अपराधियों के साथ सम्पर्क में आने के बाद मानसिकता में रूपान्तरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के साथ उठने-बैठने का मानसिकता पर पडऩे वाला असर चरित्र को बदल डालता है। एक विचारक ने कहा है कि 'आप मुझे अपने दोस्तों के बारे में बता दो, मैं यह बता दूंगा कि आप कौन हो।


(सौरभ तिवारी दैनिक हरिभूमि (रायपुर) में वरिष्ठ उप संपादक के पद पर कार्यरत हैं और जनसामान्य तथा विकास से जुडे मुद्दों पर गहरी पकड़ के साथ लेखन करते हैं.)

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