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तो मुफ्त में मिल सकती है रोटी

  • अमित मंडलोई
इंदौर. अनाज की आसमान छूती कीमतों ने अच्छे-खासे परिवारों का बजट बिगाड़ दिया है। मौजूदा स्थितियों को देखते हुए निकट भविष्य में इस स्थिति में बदलाव के आसार भी कम ही नजर आ रहे हैं। ऐसे में यही सवाल उठता है कि आखिर इस स्थिति से कैसे उबरे। खेतों से "ोदाम तक की प्रक्रिया में अनाज नष्ट होने से बचा लिया जाए तो ही स्थिति पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।
संभाग के सातों जिलों में इस बार करीब चार लाख 75 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की बोवनी की गई थी। कृषि विभाग के अनुसार करीब 19 लाख टन गेहूं का उत्पादन हुआ है। इसमें से करीब 15 प्रतिशत किसान खुद के उपयोग व बीज के लिए रख लेते हैं। शेष गेहूं बाजारों में पहुंचता है। इस बार अभी से सारे सरकारी गोदाम भर चुके हैं।
दरअसल सरकारी गोदामों में केवल दो लाख टन गेहूं रखा जा सकता है। चार सौ निजी वेयर हाउस मिलाकर भी 40 से 45 फीसदी जरूरत ही पूरी हो पा रही है। शेष गेहूं या तो मंडियों व अन्य संस्थाओं में खुले में पड़ा खराब हो रहा है या व्यापारी अपने हिसाब से उसका भंडारण कर रहे हैं। शहर से कुछ ही दूर मांगलिया में ही सड़क के पास खुले में ही गेहूं के ढेर देखे जा सकते हैं। ऐसी ही स्थिति मंडियों की भी है।
फसल कटाई से लेकर ट्रांसपोर्टेशन और भंडारण में हो रहे नुकसान का अंदाजा लगाएं तो संभाग में ही हर साल 3।8 लाख टन गेहूं नष्ट हो रहा है। प्रति व्यक्ति चार सौ ग्राम प्रतिदिन के हिसाब से यह गेहूं 26 लाख 38 हजार लोगों का पूरे साल पेट भरने के लिए काफी है। इस लिहाज से यदि इस फिजूलखर्ची को 10 प्रतिशत तक कम कर दें तो भी 13 लाख 19 हजार लोगों की सालभर की रोटी का इंतजाम हो सकता है, जो शहर की आधी आबादी के बराबर है। सहायक संचालक कृषि उत्तमसिंह जादौन मानते हैं यदि इस अनाज को बचा लिया जाए तो हमें आयात की जरूरत ही नहीं पड़े।
सौजन्य-भास्कर

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