Monday

उनका नजरिया

हमारे मंत्री समस्याओं को निर्विकार भाव से देखते हैं। जैसे सिंगापुर में एक सम्मेलन में हमारे वाणिज्य मंत्री कमलनाथ ने कहा कि देश में अनाज की कमी इसलिए हो रही है कि गरीब लोग ज्यादा खाने लगे हैं। पहले वे एक बार खाते थे, अब दो बार खाते हैं। अनाज की खपत बढ़ी है, देश के सामने यह एक नई चुनौती है। कमलनाथ ने समस्या को निर्विकार भाव से देखा है। उन्हें यह कहने में लाज नहीं आती कि अभी तक इस देश में गरीब लोग एक बार खाते थे। यह देख कर खुशी नहीं होती कि अब उन्हें दो वक्त की रोटी नसीब हो पा रही है। गरीबों के लिए उनके मन में कोई भावना, कोई अपराधबोध या करुणा नहीं है। उनके लिए यह बदलाव एक तथ्य है, जो एक नई समस्या का भी कारण है। इस स्थिति या बदलाव के प्रति वे तटस्थ हैं। उनका काम है वाणिज्य की संभावनाओं की खोज करना, देश में विदेशी मुद्रा के ढेर लगा देना। वे अपना काम किसी प्रफेशनल की तरह पूरी निष्ठा से कर रहे हैं। देश को समृद्ध करना है, देश के गरीबों की चिंता उनके पोर्टफोलियो में नहीं है, और दिल में भी नहीं। अभी कुछ ही रोज पहले कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा था कि गेंहू की खपत बढ़ गई है, क्योंकि दक्षिण के लोग भी चपाती खाने लगे हैं। इस आवश्यकता की सप्लाई राष्ट्र की चुनौती है। कुछ लोग वास्तव में लोकतांत्रिक होते हैं, कुछ लोग मजबूर हो कर उसे ओढ़ लेते हैं। भीतर से उनका मन राजा की तरह होता है। जनता उनकी प्रजा होती है। उसके खाने-पहनने पर उनकी नजर रहती है। प्रजा में खुशहाली आती है, तो उनकी आंखों में चुभता है। प्रजा के लिए वे जो करते हैं, वह एहसान करते हैं। इसीलिए जिस देश में 30 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है, उस देश में भी शाइनिंग इंडिया और 9 फीसदी ग्रोथ रेट का जश्न मनाया जाता है। उसमें अनेक अर्थशास्त्री भी लोकतंत्र ओढ़ कर आंकड़ों की तुरही बजाते हैं। तथ्य सार्वजनिक होते हैं, नजरिया व्यक्तिगत होता है। जैसे महंगाई बढ़ी है, यह एक तथ्य है। लेकिन इस महंगाई को देखने का अपना-अपना नजरिया होता है। जैसे अनाज की कमी हो रही है, यह एक तथ्य है। लेकिन यह कमी क्यों हो रही है, इसे देखने का अपना-अपना नजरिया हो सकता है। मंत्री भी एक आदमी होता है, इसे देखने का उसका अपना नजरिया हो सकता है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपना नजरिया व्यक्त करने का अधिकार है। लोकतंत्र उस व्यक्ति के बारे में अपना नजरिया बाद में व्यक्त करता है!

संपादकीय-नवभारत टाइम्स
07 अप्रैल 2008

No comments: