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फेरबदल के बाद

केंद्रीय मंत्रिमंडल में विस्तार और फेरबदल का यदि कोई उल्लेखनीय पक्ष है तो यह कि दो युवा नेताओं को आगे बढ़ने का अवसर प्रदान किया गया। ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद की केंद्रीय मंत्रिपरिषद में मौजूदगी से युवा नेतृत्व को खुद को साबित करने का मौका मिलेगा। पता नहीं केंद्रीय मंत्रिमंडल में युवाओं को अवसर देने में इतनी देर क्यों की गई? ऐसा तो तभी कर देना चाहिए था जब राहुल गांधी को कांग्रेस महासचिव बनाया गया था। ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद सहित जो अन्य चेहरे केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल हुए हैं उनके जरिये संप्रग सरकार क्षेत्रीय संतुलन कायम करने और अपनी अन्य आकांक्षाएं पूरी करने में भले ही सफल हो जाए, अपनी छवि का निर्माण करने में वह शायद ही सक्षम हो सके। इसकी भी संभावना कम है कि इस फेरबदल से केंद्रीय सत्ता की कार्यशैली में कोई बुनियादी परिवर्तन आएगा, जबकि आज आवश्यकता इसी बात की अधिक है कि सरकारी कामकाज का तौर-तरीका बदले और यह बदलाव आम जनता को नजर भी आए। यह इसलिए और भी आवश्यक हो जाता है, क्योंकि हाल ही में यह उजागर हुआ है कि संप्रग सरकार संसद में दिए गए आश्वासनों को पूरा करने के मामले में फिसड्डी साबित हो रही है। ध्यान रहे कि यह निष्कर्ष और किसी का नहीं, संसदीय कार्य मंत्रालय का है। केंद्रीय मंत्रिपरिषद में सात नए चेहरों को शामिल करने के साथ जिस तरह कुछ मंत्रियों के विभागों में फेरबदल किया गया उससे यह संकेत मिलता है कि किसी को पुरस्कृत किया गया तो किसी को चेताया भी गया। इसी तरह कुछ मंत्रियों को राज्यसभा का कार्यकाल खत्म होते ही बाहर का रास्ता भी दिखा दिया गया। इसमें कोई हर्ज नहीं। अपेक्षाओं पर खरे न उतरने वाले मंत्रियों को ढोते रहने का कोई औचित्य नहीं। वैसे यह सवाल अपनी जगह मौजूद है कि क्या जो मंत्री हटाए गए उनकी छुंट्टी करने के लिए उनकी राज्यसभा की सदस्यता खत्म करने की प्रतीक्षा की गई?
केंद्रीय मंत्रिमंडल में विस्तार और फेरबदल से यह स्पष्ट है कि ज्यादातर केंद्रीय मंत्री इस प्रक्रिया से अछूते रहे। प्रश्न है कि क्या शेष सभी मंत्रियों का कार्य संतोषजनक है? नि:संदेह केंद्रीय सत्ता के नीति-नियामक ऐसा ही दावा करेंगे, लेकिन ऐसे दावों का तब तक कोई अर्थ नहीं जब तक आम जनता उन पर भरोसा न करे। चूंकि केंद्रीय मंत्रिमंडल से जो चेहरे बाहर हुए उनमें सभी कांग्रेस के हैं इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह महज संयोग है या फिर गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री की मजबूरी का परिणाम? गठबंधन सरकार की कुछ खूबियां हो सकती हैं और हैं भी, लेकिन भारत में गठजोड़ की जैसी राजनीति है उसमें प्रधानमंत्री के मंत्री चयन के विशेषाधिकार का प्राय: हनन होता है। विडंबना यह है कि इस समस्या का कोई समाधान दूर-दूर तक नजर नहीं आता। यदि गठबंधन राजनीति में प्रधानमंत्री को पसंद के मंत्रियों का चयन करने और उनके मंत्रालय तय करने का अधिकार नहीं मिलता तो इसका कुछ न कुछ असर सरकार के कार्यो पर पड़ना स्वाभाविक है। जो भी हो, यह राहतकारी है कि इस फेरबदल में प्रधानमंत्री की पहले जैसी मजबूरी की झलक नहीं मिली। कोई ऐसा चेहरा मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हुआ जिसे दागी कहा जा सके।
संपादकीय- जागरण
08 अप्रैल 2008

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