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वृक्ष बनते विश्वास के बीज

  • संजय द्विवेदी
देश के नेतृत्व के साथ-साथ आम आदमी के भीतर पैदा हुए आत्मविश्वास ने विकास की गति बहुत बढ़ा दी है। भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता की तमाम कहानियों के बीच भी विश्वास के बीज धीरे-धीरे एक वृक्ष का रूप ले रहे हैं। आजादी के ६ दशक पूरे करने के बाद हमारे भारतवंशी आज दुनिया के हर देश में एक नई निगाह से देखे जा रहे हैं। उनकी प्रतिभा का आदर और मूल्य भी उन्हें मिल रहा है। आजादी के लड़ाई के मूल्य आज भले थोड़े धुंधले दिखते हों या राष्ट्रीय पर्व औपचारिकताओं में लिपटे हुए, लेकिन यह सच है कि देश की युवा शक्ति आज भी अपने राष्ट्र को उसी जज्बे से प्यार करती है, जो सपना हमारे सेनानियों ने देखा था। आजादी की जंग में जिन नौजवानों ने अपना सर्वस्व निछावर किया, वही ललक और प्रेरणा आज भी भारत के उत्थान के लिए नई पीढ़ी में दिखती है। हमारे प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र में भले ही संवेदना घट चली हो, लेकिन आम आदमी आज भी बेहद ईमानदार और नैतिक है। वह सीधे रास्ते चलकर प्रगति की सीढिय़ां चढऩा चाहता है। यदि ऐसा न होता तो विदेशों में जाकर भारत के युवा सफलताओं के इतिहास न लिख रहे होते। जो विदेशों में गए हैं, उनके सामने यदि अपने देश में ही विकास के समान अवसर उपलब्ध होते तो वे शायद अपनी मातृभूमि को छोडऩे के लिए प्रेरित न होते। बावजूद इसके विदेशों में जाकर भी उन्होंने अपनी प्रतिभा, मेहनत और ईमानदारी से भारत के लिए एक ब्रांड एंबेसेडर का काम किया है। यही कारण है कि सांप, सपेरों और साधुओं के रूप में पहचाने जाने वाले भारत की छवि आज एक ऐसे तेजी से प्रगति करते राष्ट्र के रूप में बनी है, जो तेजी से अपने को एक महाशक्ति में बदल रहा है। आर्थिक सुधारों की तीव्र गति ने भारत को दुनिया के सामने एक ऐसे चमकीले क्षेत्र के रूप में स्थापित कर दिया है, जहां व्यवसायिक विकास की भारी संभावनाएं देखी जा रही हैं। यह अकारण नहीं है कि तेजी के साथ भारत की तरफ विदेशी राष्ट्र आकर्षित हुए हैं। बाजारवाद के हो-हल्ले के बावजूद आम भारतीय की शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियों में व्यापक परिवर्तन देखे जा रहे है। ये परिवर्तन आज भले ही मध्यवर्ग तक सीमित दिखते हों, इनका लाभ आने वाले समय में नीचे तक पहुंचेगा। भारी संख्या में युवा शक्तियों से सुसज्जित देश अपनी आंकाक्षाओं की पूर्ति के लिए अब किसी भी सीमा को तोडऩे को आतुर है। युवा शक्ति तेजी के साथ नए-नए विषयों पर काम कर रही है, जिसने हर क्षेत्र में एक ऐसी प्रयोगधर्मी और प्रगतिशील पीढ़ी खड़ी की है, जिस पर दुनिया विस्मित है। सूचना प्रौद्योगिकी, फिल्में, कृषि और अनुसंधान से जुड़े क्षेत्रों या विविध प्रदर्शन कलाएं हर जगह भारतीय प्रतिभाएं वैश्विक संदर्भ में अपनी जगह बना रही हैं। शायद यही कारण है कि भारत की तरफ देखने का दुनिया का नजरिया पिछले एक दशक में बहुत बदला है। ये चीजें अनायास और अचानक घट गईं हैं, ऐसा भी नहीं है। देश के नेतृत्व के साथ-साथ आम आदमी के अंदर पैदा हुए आत्मविश्वास ने विकास की गति बहुत बढ़ा दी है। भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता की तमाम कहानियों के बीच भी विश्वास के बीज धीरे-धीरे एक वृक्ष का रूप ले रहे हैं।
लेखक हरिभूमि रायपुर में स्थानीय संपादक हैं।

E-mail-123dwivedi@gmail.com

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

मन्तोष जी आप की इस सकारात्मक पोस्ट ने मन हलका किया। लेकिन क्यों हाय तोबा कि प्रतिभाएं बाहर क्यों जा रही हैं। यहाँ आरक्षण अभी जारी है। क्यों कि हम साधनों से कई गुना आबादी में वृद्धि करते हैं। रोजगार पैदा नहीं करते। जाने दो लोगों को बाहर। इसी तरह भारत चमकेगा। प्रतिभाएं आत्महत्या तो नहीं करेंगी।

sourabh said...

तमाम सकारात्मक तर्को के बावजूद यह भी एक कड़वी सच्चाई है की देश पर अविश्वास की वजह से ही विश्वास के बीजो का रोपण विदेशो मे हो रहा है जिनके वृक्ष बनने की बात आप कर रहे हैं .दूर देश मे फल-फूल रहे इन वृक्षों को पता है कि आरक्षण कि विषबेल उन्हें पनपने नहीदेगी