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सभी जिलों में रोजगार योजना

केंद्रीय सत्ता के आश्वासन के अनुरूप रोजगार गारंटी योजना पूरे देश में लागू हो गई। ऐसा होने को केंद्र सरकार अपनी सफलता के रूप में प्रचारित कर सकती है और साथ में यह दावा भी कि उसे सचमुच आम आदमी की परवाह है, लेकिन इस योजना के उजागर हो चुके छिद्रों की अनदेखी करना सच्चाई से मुंह मोड़ना है। इस योजना में किस तरह के छिद्र हैं, इसके प्रमाण स्वयं सोनिया गांधी और राहुल गांधी के समक्ष भी सामने आ चुके हैं। इसके अतिरिक्त कैग की रपट भी इस महत्वाकांक्षी योजना की खामियों को रेखांकित कर चुकी है। विभिन्न गैर सरकारी संगठनों का भी यह निष्कर्ष है कि इस योजना को सही तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है। इसकी पुष्टि केंद्र सरकार की ओर से बुलाई गई राज्यों के मुख्य सचिवों की उस बैठक से भी हुई थी जो रोजगार गारंटी योजना के क्रियान्वयन में सामने आई समस्याओं का समाधान करने के लिए बुलाई गई थी। क्या उन सभी समस्याओं का समाधान हो गया है? केंद्र सरकार चाहे जैसे दावे क्यों न करे, यह मानना सही नहीं होगा कि इस योजना को देश के सभी जिलों में लागू करने के पहले उसकी खामियों को दूर कर लिया गया है। ध्यान रहे कि रोजगार गारंटी योजना समेत अन्य केंद्रीय योजनाओं में खामियों के चलते ही राहुल गांधी को यह टिप्पणी करनी पड़ी थी कि केंद्र से मिले एक रुपये में से पांच पैसे ही निर्धारित मद में खर्च हो पाते हैं। पिछले दो वर्षो का अनुभव यह बताता है कि रोजगार योजना वहीं पर ही सही ढंग से लागू हो सकी है जहां गैर सरकारी संगठनों ने सक्रियता दिखाई और संबंधित अधिकारियों ने ईमानदारी का परिचय दिया। दुर्भाग्य से ऐसा बहुत कम स्थानों पर हुआ है। दरअसल सबसे बड़ी समस्या सरकारी अमले के गैर जिम्मेदार और भ्रष्ट रवैये की है। रही-सही कसर राज्य सरकारों की उदासीनता ने पूरी कर दी है।
रोजगार गारंटी योजना की कुछ खामियां तो संबंधित कानून में ही निहित हैं, जैसे कि रोजगार न मिलने की स्थिति में बेरोजगारी भत्ता देने का प्रावधान। चूंकि इस भत्ते को राज्य सरकारों की इच्छा पर छोड़ दिया गया है इसलिए किसी को भी बेरोजगारी भत्ता नहीं मिल रहा है। केंद्र सरकार इससे भी परिचित होगी कि मजदूरों को पूरी मजदूरी नहीं दी जाती या फिर जाब कार्ड के बावजूद उन्हें रोजगार के लिए इंतजार करना पड़ता है। गरीब परिवार के एक सदस्य को वर्ष में मात्र सौ दिन का रोजगार और उस पर भी इतनी बाधाएं। ये बाधाएं रोजगार योजना में निहित गारंटी शब्द को खोखला करने का ही काम कर रही हैं। क्या यह सही समय नहीं जब इन बाधाओं को दूर किया जाए ताकि निर्धन परिवारों को कम से कम सौ दिन का रोजगार और पूरी मजदूरी तो मिल सके? नि:संदेह यह समस्या कोई खास जटिल नहीं कि आम बजट में रोजगार गारंटी योजना के लिए पर्याप्त धनराशि का आवंटन नहीं हुआ है। समस्या यह है कि आवंटित धन का दुरुपयोग रोकने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं बनाई जा सकी है। ऐसा नहीं है कि ऐसी व्यवस्था बनाई नहीं जा सकती। कठिनाई यह है कि सत्ता में बैठे लोग नौकरशाही को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए तैयार नहीं। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री का यह दावा सही हो सकता है कि पिछले वित्तीय वर्ष में इस योजना के लिए आवंटित धन की पाई-पाई खर्च कर दी गई है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि वह सही मद में खर्च हुआ है।
संपादकीय- जागरण
03 अप्रैल 2008

1 comment:

आशीष said...

इस योजना के लिए हम लोगों ने काफी आंदोलन किया था लेकिन भष्‍ट्राचार के कारण अन्‍य योजना की तरह इसका भी सत्‍यानाश किया जा रहा है