Total Pageviews

Monday

अशुभ संकेत

अफगानिस्तान में तालिबान आतंकियों के हमले में तीन भारतीयों की मौत एक बार फिर इस सच्चाई को बयान कर रही है कि वहां अमन-चैन की बहाली के लिए जो भी देश सक्रिय हैं उनकी मुश्किलें कम होने के बजाय बढ़ती जा रही हैं। सीमा सड़क संगठन के ठिकाने पर आत्मघाती आतंकी कार्रवाई यह भी साबित करती है कि अफगानिस्तान में तालिबान अभी भी खतरा बने हुए हैं। ये आतंकी नाटो सेना के जवानों को निशाना बनाने के साथ जिस तरह अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में जुटे विदेशी सहायता दलों पर हमले कर रहे हैं उससे तो यही जाहिर होता है कि उनकी दिलचस्पी अपने देश को अस्थिर रखने में ही अधिक है। ऐसे तत्व वे चाहे जिस नाम से जाने जाएं, सभ्य समाज के शत्रु हैं। ऐसे तत्वों का निर्ममतापूर्वक दमन किया जाना चाहिए, लेकिन अफगानिस्तान की करजई सरकार ऐसा नहीं कर पा रही है। विडंबना यह है कि करजई सरकार कभी-कभी आतंकी संगठनों से बातचीत कर बीच का रास्ता तलाशने की कोशिश करती दिखती है। वह कंट्टरपंथियों के समक्ष झुकती हुई भी नजर आ रही है। हाल ही में भारतीय चैनलों पर लगाया गया प्रतिबंध कुल मिलाकर कट्टरपंथियों के बोलबाले को ही प्रमाणित करता है। यह चिंताजनक है कि अफगानिस्तान में पिछले छह-सात वर्षो में विदेशी सैनिकों की उपस्थिति के बावजूद हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। वर्तमान में वहां नाटो के नेतृत्व में करीब पचास हजार सैनिक तैनात हैं, लेकिन वे पर्याप्त साबित नहीं हो रहे। अफगानिस्तान के अनेक इलाके अभी भी तालिबान के गढ़ के रूप में जाने जाते हैं। कुछ इलाकों में तो उनकी ताकत घटने के बजाय बढ़ रही है। इसके पीछे अनेक कारण हैं और उनमें से एक पाकिस्तान की अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में दिलचस्पी न होना है।
अपने संकीर्ण स्वार्थो के चलते पाकिस्तान इस आशंका से ग्रस्त है कि अफगानिस्तान में शांति व्यवस्था कायम होने से इस देश में उसकी पूछ नहीं रह जाएगी। वह गुपचुप रूप से ऐसे अनेक काम कर रहा है जिससे अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में सहायता कर रहे देश और विशेष रूप से भारत हतोत्साहित हो। क्या यह विचित्र नहीं कि वह अफगानिस्तान को सहायता देने में भारत को अपनी भूमि का इस्तेमाल नहीं करने दे रहा है? भारत सरकार अफगानिस्तान में निर्माण संबंधी जो अनेक कार्य करा रही है उनमें पाकिस्तान पोषित और प्रेरित आतंकी तत्व लगातार अड़ंगा डाल रहे हैं। वस्तुत: यही कारण है कि अफगानिस्तान में कार्यरत भारतीयों पर जब-तब हमले होते ही रहते हैं। इस वर्ष यह दूसरी बार है जब भारतीयों को निशाना बनाया गया। यह ठीक है कि भारत सरकार अफगानिस्तान में अपने लोगों पर हमलों के खिलाफ सख्त रवैये का प्रदर्शन करते हुए यह कह रही है कि वह तालिबान के आगे घुटने नहीं टेकेगी, लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि अफगानिस्तान में कार्यरत भारतीय सुरक्षित रहें और यदि कोई उनकी सुरक्षा के लिए खतरा बने तो उसे मुंहतोड़ जवाब दिया जाए।
संपादकीय- जागरण

No comments: