Total Pageviews

Tuesday

मूल्यहीनता का सबसे बेहतर समय-1

  • संजय द्विवेदी

आज का समय बीती हुई तमाम सदियों के सबसे कठिन समय में से है। जहां मनुष्य की सनातन परंपराएं, उसके मूल्य और उसका अपना जीवन ऐसे संघर्षों के बीच घिरा है, जहां से निकल पाने की कोई राह आसान नहीं दिखती। भारत जैसे बेहद परंपरावादी, सांस्कृतिक वैभव से भरे-पूरे और जीवंत समाज के सामने भी आज का यह समय बहुत कठिन चुनौतियों के साथ खड़ा है। आज के समय में शत्रु और मित्र पकड़ में नहीं आते। बहुत चमकती हुई चीजें सिर्फ धोखा साबित होती हैं। भारतीय परंपराएं आज के समय में बेहद सकुचाई हुई सी नजर आती हैं। हमारी उज्जवल परंपरा, जीवन मूल्य, विविध विषयों पर लिखा गया बेहद श्रेष्ठ साहित्य, आदर्श, सब कुछ होने के बावजूद हम अपने आपको कहीं न कहीं कमजोर पाते हैं। यह समय हमारी आत्मविश्वासहीनता का भी समय है। इस समय ने हमें प्रगति के अनेक अवसर दिए हैं, अनेक ग्रहों को नापतीं मनुष्य की आकांक्षाएं, चांद पर घर बनाने की लालसाएं, बड़े-बड़े मेगा माल्स, सैकड़ों चैनलों वाला बुद्घू बक्सा, विशाल होते भवन, कारों के नए माडल, ये सारी चीजें भी हमें कोई ताकत नहीं दे पातीं। विकास के पथ पर दौड़ती नई पीढ़ी जैसे जड़ों से उखड़ती जा रही है। इक्कीसवीं सदी में घुस आई यह जमात जल्दी और ज्यादा पाना चाहती है और इसके लिए उसे किसी भी मूल्य को शीर्षासन कराना पड़े, तो कोई हिचक नहीं। यह समय इसीलिए मूल्यहीनता के सबसे बेहतर समय के लिए जाना जाएगा। यह समय सपनों के टूटने और बिखरने का भी समय है। यह समय उन सपनों के गढऩे का समय है, जो सपने पूरे तो होते हैं, लेकिन उसके पीछे तमाम लोगों के सपने दफ्न हो जाते हैं। ये समय सेज का समय है, निवेश का समय है, लोगों को उनके गांवों, जंगलों, घरों और पहाड़ों से भगाने का समय है। ये भागे हुए लोग शहर आकर नौकर बन जाते हैं। इनकी अपनी दुनिया जहां ये 'मालिक की तरह रहते थे, आज के समय को रास नहीं आती। ये समय उजड़ते लोगों का समय है। गांव के गांव लुप्त हो जाने का समय है। ये समय ऐसा समय है, जिसने बांधों के बनते समय हजारों गांवों को डूब में जाते हुए देखा है। यह समय 'हरसूद को रचने का समय है। खाली होते गांव, ठूंठ होते पेड़, उदास होती चिडिय़ा, पालीथिन के ग्रास खाती गाय, फार्म हाउस में बदलते खेत, बिकती हुई नदी, धुंआ उगलती चिमनियां, काला होता धान ये कुछ ऐसे प्रतीक हैं, जो हमें इसी समय ने दिए है। यह समय इसीलिए बहुत बर्बर हैं। बहुत निर्मम और कई अर्थों में बहुत असभ्य भी। यह समय आंसुओं के सूख जाने का समय है। यह समय पड़ोसी से रूठ जाने का समय है। यह समय परमाणु बम बनाने का समय है। यह समय हिरोशिमा और नागासाकी रचने का समय है। यह समय गांधी को भूल जाने का समय है। यह समय राम को भी भूल जाने का समय है। यह समय रामसेतु को तोडऩे का समय है। उन प्रतीकों से मुंह मोड़ लेने का समय है, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं। यह जड़ों से उखड़े लोगों का समय है और हमारे सरोकारों को भोथरा बना देने का समय है। यह समय प्रेमपत्र लिखने का नहीं, चैटिंग करने का समय है। इस समय ने हमें प्रेम के पाठ नहीं, वेलेंटाइन के मंत्र दिए हैं। यह समय मेगा माल्स में अपनी गाढ़ी कमाई को फूंक देने का समय है। यह समय पीकर परमहंस होने का समय है। इस समय ने हमें ऐसे युवा के दर्शन कराए हैं, जो बदहवास है। वह एक ऐसी दौड़ में है, जिसकी कोई मंजिल नहीं है। उसकी प्रेरणा और आदर्श बदल गए हैं। नए जमाने के धनपतियों और धनकुबेरों ने यह जगह ले ली है। शिकागो के विवेकानंद, दक्षिण अफ्रीका के महात्मा गांधी अब उनकी प्रेरणा नहीं रहे। उनकी जगह बिल गेट्स, लक्ष्मीनिवास मित्तल और अनिल अंबानी ने ले ली है। समय ने अपने नायकों को कभी इतना बेबस नहीं देखा। नायक प्रेरणा भरते थे और जमाना उनके पीछे चलता था। आज का समय नायकविहीनता का समय है। डिस्को थेक, पब, साइबर कैफे में मौजूद नौजवानी के लक्ष्य पकड़ में नहीं आते। उनकी दिशा भी पहचानी नहीं जाती। यह रास्ता आज के समय से और बदतर समय की तरफ जाता है। बेहतर करने की आकांक्षाएं इस चमकीली दुनिया में दम तोड़ देती हैं। 'हर चमकती चीज सोना नहीं होती लेकिन दौड़ इस चमकीली चीज तक पहुंचने की है।

शेष कल के अंक में

लेखक हरिभूमि रायपुर में स्थानीय संपादक हैं।

1 comment:

Sanjeet Tripathi said...

द्विवेदी जी को पढ़ना वाकई एक अलग ही अनुभव है!!