Wednesday

काबू से बाहर

महंगाई की ट्रेन ने स्पीड पकड़ ली है। क्या इसे रोका जा सकेगा? सरकार जो उपाय कर रही है और रिजर्व बैंक जो कदम उठाएगा, वे नाकाफी साबित हो सकते हैं। अब इस हकीकत के आगे सभी घुटने टेकते दिख रहे हैं कि महंगाई को रोकने के लिए अगर हमें ग्रोथ रेट से समझौता करना पड़े, तो किया जाए। वित्त मंत्री चिदम्बरम इसका संकेत दे चुके हैं, जिससे पता चलता है कि हमारे पास विकल्प नहीं बचे। सरकार ने तेल के आयात पर शुल्क घटाने और चावल के निर्यात पर रोक लगाने जैसे कई कदम उठाए हैं, जिनका थोड़ा बहुत असर पड़ सकता है। जैसे हमारी खपत का आधा खाद्य तेल बाहर से आता है। सस्ता आयात यहां कीमतों को बांधेगा, लेकिन सीमा पर की जा रही यह मोर्चाबंदी इसलिए नाटकीय बदलाव नहीं ला सकती कि ग्लोबल मार्केट में भी कीमतें उफान पर हैं। दरअसल महंगाई सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। विदेशों में भी इसकी मार पड़ रही है, क्योंकि खाद्यान्न की पैदावार कम हो रही है और उपभोग बढ़ रहा है। दूसरी जिंसों के मामले में भी कहानी कुछ ऐसी ही है। उस पर क्रूड ऑयल की चढ़ती कीमतें हर चीज को महंगा बना रही हैं। बल्कि खतरा तो यह भी है कि अगर इम्पोर्ट को पूरी तरह आसान बना दिया जाए या एक्सपोर्ट एकदम बंद कर दिया जाए, तो घरेलू बाजार में गड़बड़ियां पैदा हो सकती हैं। जैसे किसानों की आमदनी गिर सकती है, जिससे नई राजनीतिक समस्याएं पैदा होंगी। या फिर घरेलू उत्पादन घट जाएगा, जो आगे चलकर मुसीबत की वजह बनेगा। जाहिर है, कुछ दूसरे उपाय भी किए जाएंगे, जैसे मौद्रिक नीति में फेरबदल। ऐसा लगता है कि इस महीने कभी आरबीआई बैंकों के कैश रिजर्व रेशो को बढ़ाकर पैसे की सप्लाई रोकने की कोशिश करेगा। हो सकता है कि वह इंटरेस्ट रेट बढ़ाकर सीधे दखल की कोशिश करे। ऐसे तरीकों से सिस्टम में पैसा कम पड़ने लगता है और खर्च कम होने के साथ डिमांड घटने लगती है, जो कीमतों को नीचे लाती है। इस कदम का सीधा असर आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है, जो ग्रोथ रेट में गिरावट के तौर पर सामने आएगा। वित्त मंत्री का इशारा इसी ओर रहा होगा, लेकिन अगर इतना ही हो, तो भी गनीमत है। डर तो यह है कि हमें गिरती ग्रोथ रेट और महंगाई दोनों को साथ-साथ झेलना पड़े। हो सकता है कि हम ऊंची महंगाई के दौर में स्थायी तौर पर पहुंच गए हों, जहां ऐतिहासिक कीमतों की वापसी की गुंजाइश खत्म हो चुकी हो। इस बात को साबित होने में अभी वक्त लगेगा, और शायद हम कुछ उपायों से इस ट्रेंड को सहनीय हदों तक खींच ही लाएं। इसके लिए कुछ प्रशासकीय उपायों की बेहद जरूरत है, जैसे कालाबाजारी और जमाखोरी पर कंट्रोल। महंगाई के खिलाफ यह एक असरदार हथियार साबित हो सकता है, लेकिन इसे चलाने से राज्य सरकारें कतराती हैं, क्योंकि बहुत से लोगों की नाराजगी, ढेर सारी मेहनत और तमाम झंझटों का डर रहता है। अब इस सरकारी नाकामी का तो कोई इलाज नहीं।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स
01 अप्रैल 2008

1 comment:

आशीष said...

एनडीए के वक्‍त में भी चमकते भारत की पोल खुली थी, ऐसे ही इस बार यूपीए के वि‍कसित भारत की पोल खुल रही है