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मूर्ति और माया

यूपी की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा अपनी ही मूर्ति के अनावरण को एक तबका उनके एक और राजनीतिक ड्रामे के रूप में देख सकता है। लेकिन मायावती की आलोचना करने या हंसी उड़ाने से पहले हमें दलित राजनीति के द्वंद्व को समझना होगा। दलित राजनीति दरअसल दो अजेंडे पर एक साथ काम करती है। एक तो राजनीतिक, दूसरा सामाजिक, हालांकि एक अर्थ में दोनों एक-दूसरे के पूरक भी हैं। दलितों को राजनीति में भागीदारी दिलाने के साथ उन्हें सामाजिक स्तर पर शेष समाज के समकक्ष खड़ा करना भी दलित नेतृत्व का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य रहा है। दलितों का समर्थ वर्ग हर स्तर पर सवर्ण की बराबरी करना या उन्हें मात देना चाहता है। इसके लिए वह उनके रीति-रिवाज, चाल-चलन को अपनाने की कोशिश करता है। जानेमाने समाजशास्त्री एम। एन. श्रीनिवास ने इस प्रवृत्ति को 'संस्कृताइजेशन' कहा था। असल में ऐसा करके दलित समुदाय यह साबित करना चाहता है कि वह किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं है। शायद यही वजह है कि बाबासाहेब आम्बेडकर ने हमेशा आधुनिक शिक्षा, रहन-सहन और पहनावे-ओढ़ा़वे की वकालत की। उन्हें लगता था कि इन्हें अपनाकर ही दलित तबका समाज की मुख्यधारा में जगह बना सकता है। समय ने साबित किया कि आम्बेडकर की सोच कितनी सही थी। इस सोच का विस्तार आज कई रूपों में हुआ है, जो कई लेवल पर अतिवादी भी लग सकता है। बीएसपी के संस्थापक कांशीराम मानते थे कि अगर किसी नेता का कद सचमुच बड़ा है तो उसके जीवनकाल में ही उसकी प्रतिमा लगाई जानी चाहिए। मूर्ति यह दर्शाएगी कि उस व्यक्ति ने जीवनकाल में ही असाधारण उपलब्धियां हासिल कर ली हैं। मायावती को लगता है कि उनका कद इस लायक हो गया है कि उनकी मूर्ति बन सके। उन्होंने अपने आप को देवी बताने में भी हिचकिचाहट नहीं महसूस की। उन्हें मंच पर नेताओं-कार्यकर्ताओं से पैर छुआना अच्छा लगा। उन्होंने सवर्ण राजनीति को शिकस्त देने के लिए उसके हर तौर-तरीके अपनाए। उन्होंने उनके नेताओं की तरह धन-संपत्ति अर्जित की, शानो-शौकत से रहना शुरू किया। दिलचस्प तो यह है कि उन्हीं की तरह मायावती पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे। इन सब से मायावती को संतोष हुआ होगा कि उन्होंने सवर्ण राजनीति को उसी की शैली में मात दी। बीएसपी समर्थक इसके लिए अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि उनकी पार्टी प्रचलित राजनीतिक संस्कृति के रंग में रंग गई या उसमें घुल-मिल गई। यह दलित राजनीति की सफलता तो हो सकती है, सार्थकता नहीं। उसकी सार्थकता तो तब होती जब मायावती की इमेज भी एक चमकदार नेता की होती। अगर उन्होंने चालू नारों, आक्रामक भाषा और धन-संपत्ति की बजाय अपने विचार और सादगी को हथियार बनाया होता तो शायद वह सवर्ण राजनीति पर निर्णायक प्रहार कर सकती थीं, पर वह ऐसा न कर सकीं। शायद उन्हें इस बात का अहसास है। इसलिए वह डरी रहती हैं कि उनका दलित वोट बैंक भी कोई छीन न ले। उनके बयानों में उनका यह भय झलकता रहता है। अपनी मूर्ति देखकर उनका अहं तुष्ट हुआ होगा पर अब वे अपने राज्य के लिए कुछ ठोस काम करके दिखाएं ताकि लोगों को लगे कि उनकी उपलब्धियां उनकी मूर्ति से बड़ी हैं।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स

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