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खजाने का रास्ता

अफ्रीका की चमक अब सबको लुभा रही है। वह 'अंधकार का महाद्वीप' नहीं रहा, जैसा कि उसे हाल तक समझा जाता रहा है। इस बात का अहसास भारत को कुछ साल पहले ही हो गया था, जब दुनिया के घटते तेल भंडारों और आसमान छूते खनिजों से घबराए देशों ने अफ्रीका के अनछुए खजानों का रुख किया। यही वक्त था, जब भारत में आर्थिक तरक्की रफ्तार पकड़ने लगी थी और साफ हो गया था कि कामयाब होने के लिए हमें बेहिसाब संसाधनों की जरूरत पड़ने वाली है। तभी चीन इस दौड़ में शामिल हुआ और देखते-देखते कई अफ्रीकी देशों में उसकी धाक जमने लगी। मुकाबले में भारत की शुरुआत सुस्त रही, लेकिन अब नई दिल्ली में आयोजित हुए अफ्रीका समिट के जरिए उस गंवाए गए वक्त की भरपाई का इरादा झलका है। भारत ऐसी उम्मीद कर सकता है, क्योंकि अगर चीन से तुलना करने की आदत से बचें, तो अफ्रीका से हमारा रिश्ता न सिर्फ काफी पुराना है, बल्कि गहरा भी है। जिस वक्त अफ्रीका के देश पश्चिमी दबदबे से आजाद होने की कोशिश में थे, भारत उनका स्वाभाविक साथी था। रंगभेद के खिलाफ जंग में भी भारत ने उनका जमकर साथ दिया। गुजरात से गए लोगों ने कई देशों की इकॉनमी में हाथ बंटाया। हाल के बरसों में भारतीय कंपनियों ने अफ्रीका के कई हिस्सों में इंफ्रास्ट्रक्चर और तेल की खोज का काम हाथ में लिया है। यानी कुल मिलाकर अफ्रीका में भारत की मौजूदगी अच्छी खासी है, लेकिन इसे नए जोश के साथ नए मुकाम तक ले जाने का बहुत बड़ा मिशन तो बाकी है ही। भारत इस मिशन को एक अलग नजरिए से देखता है। वह न तो पश्चिमी देशों की तरह दखलंदाज दिखना चाहता है और न ही चीन की तरह आक्रामक। वह एक संवेदनशील और उदार सहयोगी की तरह पेश आना चाहता है और उसे उम्मीद है कि उसका सफर न सिर्फ फायदेमंद रहेगा, बल्कि दूर तक भी जाएगा। इस लिहाज से अफ्रीका समिट की शुरुआत में प्राइम मिनिस्टर मनमोहन सिंह ने जो पेशकश की, उसे अव्वल दर्जे की व्यापारिक कूटनीति कहा जा सकता है। उन्होंने दुनिया के 50 सबसे कम विकसित देशों के लिए भारतीय बाजार पूरी तरह खोलने का ऐलान किया। इनमें से 34 देश अफ्रीका के हैं, जिन्हें अब भारतीय इम्पोर्ट में न सिर्फ तरजीह मिलेगी, बल्कि पूरी तरह शुल्क माफी भी। इसके अलावा अफ्रीका के लिए उदार कर्ज और मदद का ऐलान तो है ही। इसे अफ्रीका के देश सराहेंगे, जिन्हें माल बटोरने वाले दोस्तों की बजाय तरक्की में साझीदारों की जरूरत है। जैसे-जैसे इन देशों में विकास होगा, इनकी चेतना बढ़ेगी, वैसे-वैसे ये विदेशी सहयोगों के बीच चुनाव करने लगेंगे। इसके कुछ संकेत मिलने भी लगे हैं। मसलन धमाकेदार शुरुआत और मदद की बरसात के बावजूद चीनी तौर-तरीकों पर ऐतराज उठने लगे हैं। यह बात नापसंद की जा रही है कि चीनी अपने सस्ते माल से अफ्रीकी बाजार को पाट रहे हैं, संसाधनों पर अंधाधुंध कब्जा कर रहे हैं, स्थानीय आबादी में घुल-मिल नहीं रहे और यहां तक कि अपने देश से कामगार लेकर आ रहे हैं। इसके मुकाबले पूरे अफ्रीका में भारतीय व्यवसाय की अच्छी साख है, जिसने अफ्रीका को अपना बना लिया है। भारत-अफ्रीका रिश्तों की इस मजबूत बुनियाद पर भविष्य की इमारत खड़ी करना मुश्किल नहीं होना चाहिए।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स
१० अप्रैल २००८

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