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बेकाबू मुद्रास्फीति

मुद्रास्फीति की दर का उछलकर तीन वर्ष के उच्चतम स्तर तक पहुंचना केंद्र सरकार के मुंह पर एक करारा तमाचा जैसा है। मुद्रास्फीति दर के सात प्रतिशत तक पहुंच जाने पर केंद्रीय सत्ता के नीति-निर्माता यह सफाई पेश कर सकते हैं कि पिछले दिनों उन्होंने मूल्य वृद्धि पर लगाम लगाने के जो प्रयास किए उनका प्रभाव अभी सामने आना शेष है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि आने वाले समय में महंगाई थम ही जाए। हाल की बेमौसम की बारिश कोढ़ में खाज सिद्ध हो सकती है। फसलों को नुकसान पहुंचने की खबरें महंगाई थामने के प्रयासों को निष्प्रभावी कर सकती हैं। यह संभव है कि केंद्र सरकार महंगाई थामने के लिए बचे-खुचे उपायों का भी सहारा लेने के लिए विवश हो जाए, लेकिन आज यदि उसके पास ज्यादा विकल्प नहीं नजर आ रहे हैं तो इसके लिए वह खुद ही जिम्मेदार है। वह शायद ही यह समझ सके कि समय रहते सही कदम न उठाने के कारण ही महंगाई के मामले में हालात बेकाबू से हो गए हैं। केंद्रीय सत्ता महंगाई के समक्ष किस तरह असहाय हो गई है, इसका पता संप्रग के विभिन्न घटकों के बीच की तनातनी से चलता है। कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने एक-दूसरे को महंगाई के लिए जिस तरह दोषी ठहराने की कोशिश की उससे कुल मिलाकर केंद्रीय सत्ता की हताशा ही उजागर होती है। वैसे कांग्रेस का यह कहना सही है कि महंगाई रोकने के लिए जादू की कोई छड़ी नहीं हो सकती, लेकिन ऐसे जवाब से वह आम जनता को संतुष्ट नहीं कर सकती। अब तो वह जनता को संतुष्ट करने के स्थान पर उसे भ्रमित करती नजर आ रही है। क्या यह विचित्र नहीं कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राजस्थान में एक रैली में महंगाई के लिए राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। क्या कांग्रेस यह साबित कर सकती है कि उसके द्वारा शासित राज्यों में महंगाई की मार कम है?
महंगाई को अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की देन बताना तो समझ आता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि संप्रग सरकार के वश में कुछ है ही नहीं और यदि वास्तव में ऐसा है तो उसके सत्ता में बने रहने का क्या औचित्य? अगर केंद्रीय सत्ता आठ-नौ प्रतिशत की विकास दर का श्रेय लेने के लिए तत्पर रहती है तो फिर उसे बढ़ती मुद्रास्फीति की भी जिम्मेदारी लेनी होगी। आज यदि महंगाई चौतरफा मार करती दिख रही है तो इसलिए कि केंद्र सरकार न तो भावी अंतरराष्ट्रीय माहौल का आकलन कर सकी और न ही घरेलू हालात का। यदि खाद्यान्न की कीमतें काबू में होतीं तो महंगाई के असर को कम किया जा सकता था। ऐसा इसलिए नहीं हो सका, क्योंकि अर्थशास्त्रियों से लैस केंद्रीय सत्ता ने यह अनुमान लगाने की दिलचस्पी तक नहीं दिखाई कि आने वाले समय में खाद्यान्न की पर्याप्त उपज होगी या नहीं? समस्या इसलिए और अधिक बढ़ गई, क्योंकि खाद्यान्न आयात के फैसले लेने में अनावश्यक देर की गई। पिछले कुछ दिनों से महंगाई के पीछे जमाखोरों और बिचौलियों की भूमिका का जिस तरह जिक्र होने लगा है उससे तो यह लगता है कि हर कोई केंद्रीय सत्ता की कमजोरी का लाभ उठा रहा है। सच्चाई जो भी हो, महंगाई ने जिस तरह सुरसा सरीखा मुंह खोल लिया है उससे आम बजट और छठे वेतन आयोग के जरिये जनता को लुभाने के केंद्र सरकार के इरादों पर पानी फिरना तय है।
संपादकीय- जागरण
05 अप्रैल 2008

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