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जलवे बिखेरता, हंसी का बाजार

  • मुकेश तिवारी
वर्ष 2006-2007 को यदि हंसी का साल कहा जाए तो गलत नहीं होगा। पूरे साल भर छोटे पर्दे से लेकर बड़े पर्दे तक मुस्काराहट का जाल फैला रहा। लाफ्टर चैंपियंस ने गांव-गांव और शहर-शहर जाकर लोगों के हंसाने का काम किया और गुस्से व परेशानियों में डूबे रहने वाले करोड़ों भारतीयों की विलुप्त हुई हंसी फिर लौटा दी। इस कार्यक्रम ने लोगों को खुलकर हंसने में मजबूर कर दिया। पिछले इतिहास में नजर डालें तो गांवों में होने वाली नौटकी, नाटक, रामलीला जैसे कार्यक्रमों में दर्शकों के मनोरंजन के लिए जोकर जैसे एक पात्र को ’शामिल किए जाने की परंपरा रही है। जैसे-जैसे सिनेमाई संसार का उदय हुआ, वैसे-वैसे करिश्माई निर्माताओं ने अभिनेताओं के साथ एक हास्य कलाकार और अभिनेत्री के साथ उसकी सहेली के रूप में एक हास्य अभिनेत्री को रखना अनिवार्य-सा कर दिया। जैसे ही यह हास्य कलाकार पर्दे नजर आता बरबस ही दर्शकों के चेहरों में मुस्कान थम जाती थी। महमूद, जानीवाकर, भगवान दादा, उमादेवी, असरानी, केस्तो मुकर्जी जैसे कलाकार वर्षों तक लोगों के दिलों पर राज करते रहे हैं और इनमें से कुछ तो आज भी दर्शकों के चहेते कलाकार हैं। बीच में एक दौर एक्शान और पशिचमी सभ्यता से जुड़ी फिल्मों व धारावाहिकों का आया। इनमें हास्य का पुट तो रहा लेकिन प्रमुखता से नहीं। इस बीच हास्य के क्षेत्र में दौर फिर बदला जब अभिनेताओं ने हंसोड़े अभिनय को अपने कैरियर में जोड़ कर सफलताओं में कदम रखा और स्वयं को हास्य रंग में ढाल लिया। जिनमें प्रमुख रूप से कादरखांन, शक्तिकपूर,गोविंदा, परेश रावल, संजयदत्त, अक्षयकुमार सहित अनेक कलाकार शामिल हैं। इनकी छवि दर्शको के मध्य परिवर्तित हुई। इस तरह के पात्रों को मिलती लगातार सफलताओं को भांप कर, वही कहानी और मारधाड़ देखकर ऊब चुके दर्शकों के टेस्ट को टी.वी. निर्माताओं ने पहचानकर वर्ष 2005 से हंसी का जादू जो चलाना प्रारंभ कर दिया। 2006-2007 तक वह जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोलने लगा। 2006 में लाफ्टर चैलेंज को लेकर स्टार वन को मिली जबरजस्त सफलता ने सारे सिनेमा की धारा को इसी ओर मोड़ दिया। यहां तक कि टी.वी. चैनल, फिल्म निर्माता तो दूर समाचार चैनल भी इस तरह के कार्यक्रमों से दर्शकों को रिझाने की होड़ में शामिल हो गए। न्यूज चैनलों ने राजनीति से परे हटकर हास्य को भी अपना हथियार बना लिया। इस तरह के कार्यक्रमों की शुरुआत का श्रेय न्यूज चैनलों में सबसे पहले एन.डी.टी.वी. को जाता है, जिसने ‘गुस्ताखी माफ‘ के माध्यम से चुटीले अंदाज में जनता की आवाज को पुतलों के जरिए पहुंचाने का नया अंदाज निकाला और सफलता भी प्राप्त की। दूसरी ओर ये कहें कि ‘स्टार वन‘ को गुस्ताखी माफ जैसे कार्यक्रमों ने ही आगे का रास्ता दिखाया। ऐसा नहीं कि हास्य के अन्य कार्यक्रम टी.वी. दर्शकों के सामने नहीं थे, लेकिन वास्तविक हंसी की फुहारें तब चलीं, जब लाफ्टर ने धूम मचाई। लगभग एक वर्ष के समय में ही मामूली से दर्शकों का मनोरंजन कर छोटे स्टेजों में हंसी बिखेरने वाली प्रतिभाओं और अंधेरे में जी रहे, कलाकारों में नई जान आ गई। आज राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल, राजीव निगम, अहसान कुरैशी, नवीन प्रभाकर लाखों लोगों के चहेते बन गए हैं। इस हास्य शो की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि पाकिस्तान से सुधरते रिश्तों में एक रिश्ता और जुड़ गया। वह यह था कि पाक से आए कलाकारों ने भी भारतीयों के दिलों में अपने हास्य के माध्यम से जगह बना ली। अब कभी अनाम रहे चेहरों को देखकर बरबस ही दर्शकों के चेहरों में मुस्कराहट बिखरने लगती है। लाफ्टर द्वितीय के बाद, महा-मुकाबला के आते-आते स्थिती यह हो गई कि लगभग प्रत्येक चैनल के लिए हास्य, स्कूलों की पढ़ाई में अंग्रेजी की तरह अनिवार्य हो गया। एन.डी.टी.वी. को देख आज तक, इंडिया टी.वी. और अनेक समाचार चैनल भी हंसी के हंसगुल्ले खबरों के बीच परोसने मजबूर हो गए। खौफ और ऊबाने वाले इस दौर में दर्शकों के लिए हास्य शो बड़ी उम्मीद बनकर आए हैं। दिनभर की थकान और तनाव से काफी हद तक मुक्ति दिलाने में ये शो सफल रहे हैं। इसके संबंध में मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि हास्य का यह दौर नई अर्थव्यवस्था और खुलेपन की देन है। असल में हंसी का बाजार जो वापस आया है, तो इससे स्पष्ट है कि आज समाज पर कितना बोझ है। हंसी का बाजार जिस तरह से जलवे बिखेर रहा है, उससे एक बात और सामने आती है कि वर्तमान में हास्य बिकाऊ मसाला है, तो भारतीयों के लिए इसके लक्षण शुभ हैं। क्योंकि कहा जाता है कि समाज की बुराईयों, गल्लतियों व दकियानूसी बातों से हास्यकार हमें गुदगुदाता है। दूसरी ओर पूर्ण विकसित समाज ही हास्य को समझ सकता है। हमारे भारतीय समाज ने यदि हास्य को स्वीकार किया है तो इसका मतलब यह है कि समाज में बोझ होने के बाद भी मस्ती से जीने की तमन्ना बाकी है।

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