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तुलसी की परीक्षा

भारतीय सोप ऑपेरा की चुनौतियां दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं। अब टीवी धारावाहिक निर्माताओं को टिके रहने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। आज सोप ऑपेरा को रिएलिटी शो ने पछाड़ दिया है। यह इस बात का सबूत है कि भारतीय दर्शक की रुचि तेजी से बदली है। वह विशेष छवि के साथ बंधकर नहीं रहना चाहता। शायद यही वजह है कि पिछले करीब सात सालों में औसत भारतीय परिवार में एक अहम जगह बना लेने वाले धारावाहिक 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' की लोकप्रियता उतार पर है। शुरुआती पांच सालों में तो इस सीरियल ने डबल डिजिट में टीआरपी बरकरार रखी थी। इसकी नायिका का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री स्मृति ईरानी को बेमिसाल लोकप्रियता मिली। उसकी पॉपुलैरिटी को भुनाने के लिए बीजेपी ने उसे लोकसभा चुनाव में टिकट दे दिया लेकिन वह पराजित हुईं। आठ महीने पहले जब स्मृति ने सीरियल छोड़ दिया तो 'क्योंकि ...' की टीआरपी में और कमी आई। सीरियल निर्माता एकता कपूर को लगा कि शायद दर्शक स्मृति की जगह किसी और को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए एक बार फिर स्मृति ईरानी को तुलसी की अपनी पुरानी भूमिका में लाया जा रहा है और इसका खूब प्रचार किया जा रहा है। यह एक तरह से सास-बहू मॉडल के सोप ऑपेरा की अग्नि परीक्षा है और उसे बचाने की आखिरी कोशिश। तुलसी जिस महिला का प्रतिनिधित्व कर रही है, उसकी छवि से समाज आगे जाना चाहता है। क्या वजह है कि अब कई चैनलों पर प्रसारित सीरियलों में पारिवारिक ताने-बाने से हटकर कुछ अलग तरह का कथा संसार बुना जा रहा है। इनमें जो महिलाएं हैं वे अलग किस्म की हैं। उनका संघर्ष घर की चहारदीवारी में नहीं उसके बाहर है। वह रोजी-रोजगार के लिए, अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए जूझने वाली युवा महिलाएं हैं, रोने-बिसूरने वाली भाग्य और भगवान के भरोसे जीने वाली प्रौढ़ाएं नहीं। ऐसे धारावाहिकों को हाल के सालों में दर्शकों का अच्छा समर्थन मिला है। ये सोप ऑपेरा बताते हैं कि समाज में बदलाव की छटपटाहट तेज है। समाज छवियों को स्थापित तो कर रहा है पर उसे तोड़ डालने में देर भी नहीं लगाता। एक छवि से बंधकर न रहने की प्रवृति एक परिपक्व समाज का लक्षण है। टीवी पर मनोरंजन को लेकर आ रहा वैविध्य समाज के बदलते स्वरूप और उसमें बढ़ती जनतांत्रिकता का भी सूचक है। हमारा समाज अब एकरूप और स्थिर नहीं रह गया है। उसकी हर स्तर पर गतिशीलता बढ़ी है इसलिए उसकी अपेक्षाएं भी बदल रही हैं। एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के कर्ता-धर्ता इससे बेखबर नहीं रह सकते।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स
12 अप्रैल २००८

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