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महंगाई से हारती सरकार

संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन महंगाई पर जिस तरह जबरदस्त हंगामा हुआ और दूसरे दिन सरकार की जमकर खिंचाई हुई उससे यह साफ है कि मूल्य वृद्धि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है। संप्रग सरकार के लिए यह विशेष चिंता का कारण बनना चाहिए कि महंगाई पर विरोधी दलों के साथ-साथ उसके सहयोगी दल भी उसके खिलाफ खुलकर खड़े हो गए हैं। विडंबना यह है कि महंगाई के मामले में संसद और संसद के बाहर निंदित एवं लांछित होने के बाद भी वह ऐसे व्यवहार कर रही है जैसे उसे इसका अहसास ही नहीं कि आवश्यक वस्तुओं के बढ़ते मूल्य आम आदमी के लिए कितने कष्टकारी साबित हो रहे हैं? आखिर ऐसे आचरण को संवेदनहीनता नहीं तो और क्या कहेंगे? संसद में विपक्ष और वाम दलों के समक्ष निरुत्तर रहने के बाद वित्तमंत्री चिदंबरम और कृषिमंत्री शरद पवार ने महंगाई रोकने के उपायों की जिस तरह एक और किश्त पेश की उससे तो यह लगता है कि सरकार अपनी आलोचना की प्रतीक्षा कर रही थी। आखिर प्रधानमंत्री को महंगाई पर मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाने का विचार इसके पहले क्यों नहीं आया? क्या कारण है कि अभी तक खाद्य तेल और दालों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये वितरित करने तथा वायदा कारोबार पर विचार करने की जरूरत नहीं समझी गई? भले ही उफनती महंगाई के पीछे एक कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति हो, लेकिन इस पर संदेह नहीं कि उसमें कहीं न कहीं सरकार की अदूरदर्शिता का भी योगदान है। यदि संप्रग सरकार ने महंगाई पर लगाम लगाने के लिए समय रहते सख्त कदम उठाए होते तो हालात इतने खराब नहीं होते। दुर्भाग्य से अर्थशास्त्रियों के प्रभुत्व वाली संप्रग सरकार एक ऐसी केंद्रीय सत्ता है जिसे मूल्य वृद्धि की जानकारी तब तक नहीं होती जब तक मुद्रास्फीति के आंकड़े सामने नहीं आते। इसमें संदेह है कि ये सरकारी अर्थशास्त्री इस सामान्य तथ्य से परिचित होंगे कि मुद्रास्फीति के आंकड़े महंगाई की सही तस्वीर प्रस्तुत नहीं करते। महंगाई के बढ़ते चले जाने से कहीं अधिक क्षुब्ध करने वाली बात यह है कि केंद्रीय सत्ता को अपनी कहीं कोई गलती नहीं नजर आती। वह कभी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में खाद्यान्न के बढ़ते दामों की दुहाई देती है और कभी जादू की छड़ी न होने का जुमला उछाल कर जले पर नमक छिड़कती है। अब वह महंगाई रोकने में राज्य सरकारों को उनकी भूमिका की याद दिलाते हुए उनसे अपील कर रही है। सबसे खराब बात यह है कि वह जमाखोरों और कालाबाजारियों के साथ-साथ कुछ वस्तुओं के उत्पादकों के समक्ष असहाय नजर आ रही है। वित्तमंत्री ने स्टील और सीमेंट के उत्पादकों के अनुचित रवैये का जो उल्लेख किया वह केंद्रीय सत्ता केशासन करने की क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए पर्याप्त है। यदि यह सरकार महंगाई बढ़ाने वाले ज्ञात कारणों का निवारण करने में भी समर्थ नहीं तो फिर इसका सीधा अर्थ है कि या तो उसे शासन करना नहीं आता या फिर उसने सब कुछ बाजार के हवाले करके कर्तव्य की इतिश्री कर ली है। गत दिवस संसद के दोनों सदनों में वाम दलों ने महंगाई रोकने में नाकाम संप्रग सरकार पर जैसे करारे प्रहार किए उसके बाद तो यही शेष रह जाता है कि वे समर्थन वापसी की घोषणा कर दें। वे ऐसा शायद ही करें। जो भी हो, केंद्र सरकार के रवैये से यह नहीं लगता कि वह महंगाई पर रोक लगा सकेगी।

संपादकीय- जागरण

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