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पत्रकारों की सुरक्षा

रॉयटर्स के कैमरामैन फदल शना की मौत ने युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में काम कर रहे पत्रकारों की मुश्किलों की ओर एक बार फिर दुनिया का ध्यान खींचा है। शना गाजा पर इस्त्राइली टैंक के हमले की तस्वीर खींच रहे थे, लेकिन दुर्भाग्यवश खुद इस हमले का शिकार हो गए। आज फिलिस्तीन ही नहीं इराक और अफगानिस्तान जैसे देशों में भी दुनिया भर के सैकड़ों पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर वहां के हालात की खबर पूरी दुनिया को देने में जुटे हैं। हाल के सालों में कई पत्रकारों ने वहां ड्यूटी करते हुए अपनी जान गंवा दी। पश्चिमी तट और गाजा पट्टी में वर्ष 2000 से लेकर अब तक नौ जर्नलिस्ट मारे गए, कई घायल हुए। कई बार तो सैनिकों ने जानबूझकर पत्रकारों को निशाना बनाया। कुछ पत्रकारों को तो संदेह के आधार पर पकड़ लिया गया। एपी के फोटोग्राफर बिलाल हुसेन दो साल से अमेरिकी नौसेना की कैद में थे। उन्हें अब जाकर रिहा किया गया है। अनुमान है कि इराक में युद्ध शुरू होने से लेकर अब तक वहां सवा सौ से भी ज्यादा पत्रकार मारे जा चुके हैं। इनमें ज्यादातर इराकी हैं लेकिन यूरोपीय और अमेरिकियों की भी संख्या कम नहीं है। आक्रमणकारी देशों की सत्ता ऐसे पत्रकारों को पसंद नहीं करती जो तटस्थ होकर पूरी दुनिया को सच से वाकिफ कराना चाहते हैं। इन देशों का नेतृत्व वर्ग चाहता है कि ये पत्रकार उसी की नजर से घटना को देखें। इसलिए उनकी सरकारें अपने देश के चुने हुए जर्नलिस्ट को पर्याप्त सुरक्षा और संरक्षण में युद्ध क्षेत्र में ले जाती हैं। उन पत्रकारों को सीमित जानकारी दी जाती है। इस तरह उतना ही कुछ उजागर हो पाता है जितना ये सरकारें चाहती हैं। बाकी पत्रकारों की इन्हें परवाह नहीं है। एक तरफ ये देश जनतंत्र की हिमायत करते हैं लेकिन इनमें इतनी उदारता नहीं कि सारे पत्रकारों को समान भाव से सुरक्षा प्रदान करें। आखिर पूरी दुनिया को यह जानने का हक है कि उन क्षेत्रों में क्या कुछ हो रहा है। पत्रकारों की सुरक्षा का दायित्व हर देश पर है और इस मामले में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। मीडिया के लिए युद्ध क्षेत्र में विशेष व्यवस्था की जानी चाहिए। वैसे तो सिविल नागरिकों की हिफाजत के लिए कई तरह के नियम बने हुए हैं, पर मीडिया के लिए इन कायदे-कानूनों से आगे बढ़कर भी कोई व्यवस्था करने की जरूरत है और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तत्काल कोई पहल की जानी चाहिए।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स

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