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नए मोड़ पर सीपीएम

सीपीएम की 19वीं कांग्रेस के बाद साफ है कि पार्टी की प्राथमिकताएं किस तरह बदल रही हैं। उसने कुछ समय पहले अपनी नीतियों में बदलाव के जो संकेत दिए थे, उस पर वह मजबूती के साथ चलना चाहती है। निश्चय ही ज्योति बसु और हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे दिग्गज नेताओं की पोलित ब्यूरो से विदाई के बाद सीपीएम अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। औद्योगीकरण के जबर्दस्त पैरोकार पश्चिम बंगाल के वाणिज्य और उद्योग मंत्री निरूपम सेन को पोलित ब्यूरो में शामिल कर पार्टी ने अपने रुख का इजहार कर दिया है। बसु-सुरजीत के बाद की पीढ़ी सामाजिक-आर्थिक यथार्थ को अलग नजरिए से देखती है, सियासत और शासन के तौर-तरीकों को लेकर भी उसका रवैया थोड़ा अलग है। शायद यही वजह है कि भूमि सुधार की चैंपियन रह चुकी पार्टी अब औद्योगिक विकास के जरिए आम आदमी की तरक्की का रास्ता खोजना चाहती है और इसके लिए वह मार्क्सवादी सिद्धांतों में छूट लेना चाहती है। अब इस छूट की सीमा क्या होगी, कहा नहीं जा सकता। पिछले कुछ समय से इस बात पर भी बहस छिड़ी हुई है कि कहीं ज्यादा लचीलापन सीपीएम को अपने बुनियादी उसूलों से ही दूर न कर दे और पार्टी एक मध्यमार्गी दल बनकर न रह जाए। दूसरी तरफ नंदीग्राम जैसी घटनाओं को लेकर भी पार्टी को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। देखना है कि नया नेतृत्व इन दबावों के बीच अपना रास्ता किस तरह तय करता है। सीपीएम का कहना है कि वह नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखेगी। जब सीपीएम ऐसा कहती है तो लोगों के जेहन में सवाल उठता है कि आखिर पार्टी कांग्रेस-बीजेपी की इकनॉमिक पॉलिसी और बुद्धदेव भट्टाचार्य के आर्थिक कार्यक्रमों को किन आधारों पर अलग करती है। यह सवाल ज्यों-ज्यों गहराएगा सीपीएम की विश्वसनीयता पर भी संदेह बढ़ेगा। पार्टी ने दोहराया है कि वह सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ एक गैर कांग्रेसी मोर्चा तैयार करेगी। सीपीएम ने पहले भी तीसरे मोर्चे के गठन की अगुआई की और उसे सत्ता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन क्या पार्टी को इस बात का अहसास है कि जनता तीसरे मोर्चे की बार-बार की असफलता से उकता चुकी है? थर्ड फ्रंट के नेताओं की अवसरवादिता जनता भूली नहीं है। ऐसे में क्या सीपीएम के पास कोई ठोस वैकल्पिक रास्ता है जो आम आदमी को वाकई राहत दे सके? 19वीं कांग्रेस के बाद सीपीएम भले ही जोश में हो पर उसने जनता को कोई खास उम्मीद नहीं बंधाई है।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स
05 अप्रैल 2008

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