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ये इंडिया का क्रिकेट है भिड़ू

  • मनीष सिंह
रेडियो पर क्रिकेट कॅमेंन्ट्री के दौरान एक विज्ञापन आता है। वह विज्ञापन मुझे बेहद पसंद है। विज्ञापन है- 'ये इंडिया का क्रिकेट है भिड़ू। चौका लगे ताली भिड़ू, बॉलर पिटे गाली भिड़ू। बिल्कुल सही। यही गति और नियति है भारतीय क्रिकेट और क्रिकेट-पंडितों की। दक्षिण अफ्रीका से हम दूसरा टेस्ट मैच हार गए। बुरी तरह से हारे। अब इस हार से क्रिकेट पंडित भारतीय क्रिकेट और खिलाडिय़ों को गरियाएं तो यह उनका हक बनता है। ये तो इंडिया का क्रिकेट है भिड़ू। वैसे भी उगते सूरज को सलाम करने की प्रथा रही है- कम से कम भारत में। दक्षिण अफ्रीका से मिली हार से जो क्रिकेट और क्रिकेटरों को गरिया रहे हैं, वही चार दिन पहले तिहरा शतक जमाने पर वीरेंद्र सहवाग की पीठ थपथपा रहे थे। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया दौरे में टीम को मिली जीत को गली-मुहल्लों में गा-गा कर सुना रहे थे। कह तो यह भी रहे थे कि अब ऑस्ट्रेलिया पतन की ओर है और भारतीय टीम की तुलना में कोई दूसरी टीम है ही नहीं। अब जबकि एक टेस्ट मैच में खिलाडिय़ों का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा तो उनको खरी-खोटी सुना रहे हैं। साल भर पहले का वाकया याद करें तो विश्व कप में सुपर-८ से ही बाहर हो जाने पर हम सबने भारतीय क्रिकेट और क्रिकेटरों का जो हाल किया था वह कभी भूलने वाला नहीं है। कई नए खून के नौजवानों ने तो धोनी और अन्य खिलाडिय़ों के घर पर धावा बोल दिया था। पोस्टर और पुतला जलाना तो उस समय सामान्य बात थी। ऐसा करके लोग अपने को क्रिकेट-प्रेमी जतलाने की कोशिश में थे। निश्चित तौर पर भारतीय टीम की यह हार निराशाजनक है। अपनी धरती पर यह अब तक की चौथी सबसे बड़ी हार है। हमारे खिलाडिय़ों ने वैसा खेल नहीं खेला, जिसकी हम उनसे उम्मीद करते हैं लेकिन इसका यह मतलब यह नहीं कि हम हमेशा के लिए निकम्मे हो गए हैं। हार-जीत तो खेल का हिस्सा है। यह समय है कि हम खिलाडिय़ों का मनोबल गिराने की बजाय उनको प्रोत्साहित करें और उम्मीद करें कि कानपुर में हमारे खिलाड़ी फिर से अपना स्वाभाविक खेल दिखाएंगे।
मनीष सिंह दिल्ली में एक प्रतिष्ठित अखबार में खेल पेज के प्रभारी हैं।

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