Sunday

जज्बे के आगे हारी विकलांगता


  • धनंजय शर्मा

जब उम्मीदें परवान चढ़ती हैं, तो अरमान मचलने लगते हैं। मंजिल शीशे की तरह बिलकुल साफ दिखाई देती है। कदमों और मंजिल का फासला लगातार कम होता जाता है। फासलों को रास्ते के बीच की दीवारों को लांघने में कोई कमजोरी कभी आड़े नहीं आती। बल्कि दुनिया उनके इरादों को सलाम करती है जो अपनी कमजोरी को हराकर खुद अपने लिए, देश के लिए इतिहास रचते हैं और ऐसा ही एक इतिहास रचने जा रही है अकलतरा की प्रतिभा शैलजा बैस। शैलजा की विकलांगता ने उसे और मजबूत बनाया और तैराकी की दुनिया में उसने एक अलग मुकाम कायम कर लिया। पहले गांव, फिर शहर और अब अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए चीन जाने वाली है। इस वर्ष चीन में आयोजित पैराओलंपिक के लिए उसका चयन कर लिया गया है। जांजगीर-चांपा जिले के अकलतरा की १४ वर्षीय विकलांग तैराक शैलजा बैस के माता-पिता का साया उस पर से चार साल पहले ही हट गया। यह प्रकृति की संवेदनहीनता ही है कि महज १० साल की उम्र में ने एक सड़क दुर्घटना में अपने माता पिता को खो दिया। इस दुर्घटना के समय वह स्वयं व उसका भाई माता-पिता के साथ थे लेकिन वे बच गए। माता श्रद्धा सिंह बैस व पिता राघवेन्द्र सिंह बैस के गुजरने के बाद शैलजा व उसके छोटे भाई को नाना लव सिंह चंदेल व नानी गोमती सिंह चंदेल पाला पोसा।

No comments: