Thursday

फिर लगा तीसरे मोर्चे का नारा

सीपीएम के अधिवेशन में तीसरे मोर्चे की एक बार फिर वकालत की गई है। पार्टी के महासचिव प्रकाश करात का मानना है कि देश में ऐसी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतें हैं, जो वामदलों की जनोन्मुखी नीतियों के साथ खड़ी हो सकें। अगर देखा जाए तो भारतीय राजनीति में तीसरे मोर्चे का प्रयोग नया नहीं है। आजादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस के विरोध में संयुक्त विपक्ष की कोशिशें होती रही थीं जिनमें दक्षिणपंथी जनसंघ के साथ वामदल भी शामिल होते थे।
लेकिन अस्सी के दशक में जब भाजपा ने हिंदुत्व की स्वतंत्र राह पर चलने का निश्चय किया, तभी से कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ तीसरे मोर्चे की चर्चा होने लगी। इस बीच एक बार केंद्र में सरकार बनाने के बाद भी तीसरा मोर्चा अपनी प्रासंगिकता अब तक स्थापित नहीं कर सका है। पिछले दशकों में क्षेत्रीय दलों के उभार के साथ गठबंधन की राजनीति ने अपनी पहचान बनाई और दोनों बड़े दलों ने भी गठबंधन की राजनीति को स्वीकार किया।
इसी के साथ तीसरे मोर्चे के गठबंधन की संभावनाएं भी लगातार तलाशी जाती रहीं। इसमें विसंगति यह रही कि अधिकांश छोटे दल विचारधारा के नाम पर क्षेत्रीय भावनाओं और व्यक्तिगत नेतृत्व पर आश्रित रहे तथा इन्हें एकजुट करने की पहल तभी हुई जब वे चुनाव की राजनीति में सफल नहीं हुए। लिहाजा इस पहल की विश्वसनीयता नहीं बन पाई। यह सही है कि कांग्रेस व भाजपा की नीतियों में कोई खास अंतर नहीं रहा, सिवाय हिंदुत्व को छोड़कर।
ऐसे में तीसरे मोर्चे की भूमिका वैकल्पिक नीतियों और विचारधारा के स्तर पर महत्वपूर्ण हो सकती है। इसके लिए जरूरी है कि ऐसी पहल निजी महत्वाकांक्षाओं से मुक्त रहते हुए हो और जो अवसरवाद और सौदेबाजी की राजनीति पर आधारित न हो। यही नहीं जरूरत पड़ने पर विभिन्न दलों को अपने-अपने अस्तित्व को एक नए मंच या पार्टी में विलीन करने के लिए भी तैयार रहना होगा।
कांग्रेस व भाजपा के समानांतर तीसरे मोर्चे को खड़ा करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जनाधार व नेटवर्किग की भी आवश्यकता है। तीसरे मोर्चे का गठन बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि इसकी पहल और नेतृत्व कौन सा दल कर रहा है। वामदल यह भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि उनके पास मजबूत वैचारिक धरातल है और विभिन्न दलों के बीच वैचारिक साम्यता मोर्चे को विश्वसनीयता प्रदान कर सकती है।
संपादकीय-भास्कर
03 अप्रैल 2008

No comments: