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विवादों की मशाल

पेरिस में तिब्बती प्रदर्शनकारियों और उनके समर्थकों के हंगामे के कारण ओलंपिक मशाल का कई बार बुझना खेल जगत के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। दुनिया में ओलंपिक खेल सरीखे चंद आयोजन ही ऐसे हैं जो हर प्रकार की राजनीति से अलग हैं और उन्हें अलग रखना भी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पा रहा है और शायद इस बार भी ऐसा न होने पाए। पेरिस में ओलंपिक मशाल के साथ जो कुछ हुआ वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि उसका आगे का सफर आसान नहीं। अमेरिका में उसके विरोध की व्यापक तैयारियां शुरू भी हो गई हैं और आसार इसी बात के अधिक हैं कि सब कुछ शांति से संपन्न होना कठिन होगा। सैद्धांतिक तौर पर न तो ओलंपिक खेलों का विरोध होना चाहिए और न ही उसकी मशाल का, लेकिन इन खेलों का इतिहास इसकी गवाही देता है कि वे विवादों से घिरते रहे हैं, खासकर तब जब उनका दुरुपयोग किया गया। यह लगभग तय है कि दशकों बाद एक बार फिर ओलंपिक खेल विवाद का विषय बनने जा रहे हैं। इसके लिए एक हद तक चीन ही उत्तारदायी है, जो ओलंपिकआयोजन की आड़ में अपनी खामियों को ढकने की कोशिश कर रहा है और साथ ही विश्व जनमत की परवाह करने से भी इनकार कर रहा है। भले ही चीन अभी तक अपनी घरेलू समस्याओं के संदर्भ में दुष्प्रचार का सहारा लेने में सफल रहा हो, लेकिन तिब्बत के मसले पर वह ऐसा नहीं कर सकता। इसलिए नहीं कर सकता, क्योंकि वह तिब्बत में मानवाधिकारों का निर्ममता से दमन कर रहा है। यदि यह मान भी लिया जाए कि तिब्बत उसका अंदरूनी मसला है तो भी उसे इसकी इजाजत नहीं मिल सकती कि वह तिब्बतियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करे। क्या अब यह किसी से छिपा है कि चीन का अहंकारी नेतृत्व तिब्बत की संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने में लगा हुआ है?
यह निराशाजनक है कि चीन के मनमानेपन के खिलाफ भारत समेत विश्व समुदाय की ओर से वैसी आवाज नहीं उठ रही जैसी उठनी चाहिए। शायद यही कारण है कि दुनिया भर के मानवाधिकार संगठन और कार्यकर्ता तिब्बतियों के साथ कंधे से कंधा मिला रहे हैं। नि:संदेह उनके हिंसक विरोध की तरफदारी नहीं की जा सकती, लेकिन यदि चीन और अधिक फजीहत से बचना चाहता है तो उसे एक जिम्मेदार राष्ट्र की तरह व्यवहार करना होगा। यह शुभ संकेत नहीं कि वह ऐसा करने से इनकार करने के साथ-साथ विश्व समुदाय की आकांक्षा के अनुरूप दलाई लामा से बातचीत करने से भी मुकर रहा है। वह इसी कोशिश में नजर आता है कि किसी तरह ओलंपिक शांति से निपट जाएं। जाहिर है कि इसके बाद वह और अधिक सख्त रवैया अपना लेगा। क्या उसे इसका अवसर देना चाहिए और वह भी ओलंपिक की आड़ में? ओलंपिक की मशाल यात्रा के व्यापक विरोध को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति मशाल के शेष सफर को रद करने पर विचार कर रही है। यदि वह ऐसा निर्णय लेती है तो यह समस्या का सरलीकरण होगा। इससे ओलंपिक का पावन उद्देश्य भी प्रभावित होगा। भविष्य में ऐसा भी हो सकता है कि ओलंपिक मशाल की यात्रा सदैव के लिए थम जाए। यदि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने चीन को अपने वायदों पर अमल के लिए विवश किया होता तो शायद जो स्थिति बनी उसकी नौबत नहीं आती।
संपादकीय- जागरण
09 अप्रैल 2008

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