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कहने में क्या हर्ज है

कर्नाटक के चुनावों के लिए घोषणापत्रों का युद्ध शुरू हो गया है। पहले बीजेपी ने कहा कि यदि उसकी सरकार बनी तो वह किसानों को 10 हॉर्स पावर तक के पंपिंग सेटों के लिए मुफ्त बिजली देगी। इसके अलावा वह किसानों, स्वरोजगार वालों और समाजसेवी संगठनों को 4 प्रतिशत ब्याज पर ऋण भी उपलब्ध कराएगी। इस पर कांग्रेस ने 3 फीसदी ब्याज दर पर ही ऋण दिलाने की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही वह गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले प्रत्येक परिवार को एक-एक रंगीन टीवी और 2 रुपये प्रति किलो की दर से प्रति माह 25 किलो चावल भी देगी। चुनावी घोषणापत्रों का हाल कुछ ऐसा हो गया है जैसे चालू टीवी सीरियलों में किसी फूहड़ टिप्पणी के बाद झेंप मिटाने के लिए एक्टर डायलॉग मारते हैं, 'हें॥ हें... कहने में क्या हर्ज है!' बोलने के पहले कुछ सोचने-समझने की जरूरत नहीं है। यदि उसका कुछ मतलब निकले तो अच्छी बात है, और यदि नहीं निकले तो भी नुकसान क्या है। कोई सीने पर सवार हो जाए तो वे बता सकते हैं कि पीडीएस अनाज के परिवहन का खर्च राज्य सरकार उठा ले तो इस दाम पर अनाज देना मुमकिन हो सकता है। यह नहीं तो ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के फंड से काम के बदले चावल बांटा जा सकता है। लेकिन ऐसे तकनीकी जवाब का कोई नैतिक आधार नहीं है। जो पार्टियां पांच साल के अपने शासन में अपने काम से मतदाताओं को इस बात का आभास नहीं दे पातीं कि भविष्य में वे क्या करेंगी, वे चुनाव के समय बताने का नाटक करती हैं कि यदि उन्हें फिर से जिताया गया तो वे कौन से नए जलवे बिखेरेंगी। मैनिफेस्टो जारी करने की पूरी परंपरा एक बड़बोलेपन की प्रतियोगिता में तब्दील हो गई है, जिसमें देखा यह जाता है कि कौन कितनी ऊंची हांक लेता है। बाद में उस पर अमल कितना हुआ, यह बताना कतई जरूरी नहीं होता। इसके पहले कांग्रेस पंजाब में मुफ्त बिजली देने और बीजेपी झारखंड में हर वनवासी को एक-एक गाय देने का वादा कर चुकी है। इन घोषणापत्रों में कोई विशेषता देखने की कोशिश ही बेकार है। चुनाव-प्रणाली में सुधार की जिस प्रक्रिया के तहत हम दलबदल, दागी उम्मीदवारों और बूथ कैप्चरिंग से पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रहे हैं, उसमें झूठ कैप्चरिंग और मैनिफेस्टो पर अमल की जांच का मुद्दा भी शामिल करना चाहिए।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स

2 comments:

अतुल said...

घोषणाएं तो करने के लिए ही होती है.

रवीन्द्र प्रभात said...

विल्कुल सही ....!