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‘अनाथ’ की विदाई में रो पड़ा गांव!


तिल्दा-नेवरा. छत्तीसगढ- 18 बरस की चंपा को यकीन ही नहीं था कि उस जैसी अनाथ को विदा करने पूरा गांव उमड़ पड़ेगा। रामनवमी के दिन जिस गांव की वह बेटी बन कर रही, उन्होंने बड़ी धूमधाम से उसकी शादी की। किसी ने पिता बनकर कन्यादान किया तो किसी ने मामा बनकर रस्म अदा की। और जब विदाई का वक्त आया तो हर किसी की आंखें छलक उठीं। दरअसल चंपा अनाथ होते हुए भी अकेली नहीं थी। 13 साल पहले जब वह महज पांच बरस की थी, उसके पिता दुखुराम यादव चल बसे। मां पांच साल की चंपा के जिम्मे चमेली, मोंगरा और केवरा को छोड़कर बिना बताए चली गई। वह कभी लौट कर नहीं आई। दो-तीन बरस की तीन छोटी बहनों को चंपा कैसे संभालती, उसे भी नहीं पता था। मां के गायब होने पर सिवा आंसू के कुछ नहीं बचा था। कई दिनों तक रिश्तेदारों ने भी उसके घर नहीं झांका। तब गांववालों ने चारों बहनों को पालने का बीड़ा उठाया। मोहनलाल चंद्रवंशी (70) ने बच्चियों की देखभाल का जिम्मा लिया। पूरा गांव उनके लिए माता-पिता बन गया। तीसरी तक चंपा ने पढ़ाई भी की। गांववालों ने काम दिया और उनकी जरूरतों को पूरा किया। जिंदगी की गाड़ी ऐसी ही चली और जब वह 18 साल की हुई तो गांव वालों ने ही उसके लिए पास के गांव सरारी में दूल्हा ढूंढ़ा। रामनवमी की तारीख तय हुई और दूल्हा गोवर्धन यादव बारात लेकर पहुंच गया। स्वागत में पूरा गांव खड़ा था। पहली बार ऐसा हुआ, जब किसी लड़की की विदाई में पूरा गांव रो रहा था। चंपा के आंसू तो थम नहीं रहे थे। उसे अपनी छोटी बहनों को छोड़कर जाते हुए काफी बेचैनी हो रही थी। तीनों बहनों को उसने मां की तरह पाला था। तीनों बहनें उसे ढाढस बंधा रहीं थी, कि उनकी चिंता न करे। उनकी चिंता करने के लिए पूरा गांव है। गांव का हर व्यक्ति उसे यही समझा रहा था। चंपा की विदाई के समय ऐसा कोई भी नहीं था जिनकी आंखों में आंसू नहीं थे।

साभारःभास्कर

2 comments:

अतुल said...

बहुत भावुक माहौल रहा होगा. चंपा को हमारी ओर से भी बधाई.

Udan Tashtari said...

गाँववालों को साधुवाद.