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हादसों की रफ्तार

गुजरात में नर्मदा नहर में बस गिरने से 40 से अधिक स्कूली छात्रों की मौत एक स्तब्ध करने वाली घटना है। ये सभी छात्र 12 से 15 वर्ष की उम्र के थे और राज्य परिवहन निगम की बस से परीक्षा देने जा रहे थे। नियति को कुछ और ही मंजूर था, लेकिन इस हादसे को अन्य अनेक ऐसी ही घटनाओं की तरह से महज एक दुर्घटना नहीं कहा जा सकता। विडंबना यह है कि हमारे देश में मार्ग दुर्घटनाओं को नियति मानकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है अथवा बहुत हुआ तो शोक संवेदनाएं प्रकट कर दी जाती है। चुनिंदा मामलों में जांच के आदेश दे दिए जाते है और कभी-कभी दुर्घटना का शिकार हुए लोगों के परिजनों को मुआवजे की घोषणा कर दी जाती है। आमतौर पर यह सब कुछ दुर्घटना में मारे गए लोगों की संख्या पर निर्भर करता है। शायद ही कभी स्थानीय प्रशासन अथवा राज्य सरकारे मार्ग दुर्घटनाओं में चार-छह-दस लोगों की मौतों पर ध्यान देती हों। भले ही गुजरात के बस हादसे की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए गए हों, लेकिन जांच के नतीजों से शायद ही कोई सबक सीखा जाए। दरअसल यह एक राष्ट्रीय प्रवृत्तिबन चुकी है और शायद यही कारण है कि भारत उन देशों में लगभग शीर्ष पर है जहां सड़क दुर्घटनाओं में सबसे ज्यादा लोग मारे जाते है। एक अनुमान के अनुसार देश में सड़क हादसों में प्रतिवर्ष एक लाख से अधिक लोग असमय काल के गाल में समा जाते है। सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए ज्यादातर लोग युवा अथवा अपने घर-परिवार के कमाऊ सदस्य होते है। स्पष्ट है कि जब ऐसे लोग मार्ग दुर्घटना का शिकार बनते है तो संबंधित परिवार के साथ-साथ किसी न किसी स्तर पर समाज और राष्ट्र को भी क्षति उठानी पड़ती है। समस्या यह है कि इस क्षति से अवगत होने के बावजूद सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के प्रयास किसी भी स्तर पर नहीं हो रहे है।
गुजरात बस हादसे की जांच चाहे जिस नतीजे पर पहुंचे, यह किसी से छिपा नहीं कि मार्ग दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार और चिह्नित किए जा चुके कारणों का निवारण करने से बचा जा रहा है। न तो यातायात को सुचारु रूप से चलाने की कोई व्यवस्था बन पा रही है और न ही खटारा वाहनों से छुटकारा पाने की। वाहन चालकों की दक्षता पर ध्यान देने की भी कोई जरूरत नहीं समझी जा रही। गुजरात में जो बस दुर्घटना का शिकार बनी वह एक तरह से खटारा ही थी। यह बस आठ लाख किलोमीटर का सफर तय कर चुकी थी और फिर भी राज्य परिवहन निगम के बेड़े में शामिल थी। खटारा वाहनों के संदर्भ में यह भी ध्यान रहे कि उनकी देखरेख के नाम पर खानापूरी ही अधिक होती है। कुछ राज्यों में तो परिवहन निगम की ज्यादातर बसें जैसे-तैसे चलने की हालत में होती है। बात केवल परिवहन निगम की बसों की ही नहीं, बल्कि अन्य अनेक निजी अथवा सरकारी वाहनों की भी है। गुजरात की बस दुर्घटना यह भी बता रही है कि किस तरह स्कूली बच्चों को आवागमन के सही साधन उपलब्ध नहीं है। यह भी कम चिंताजनक नहीं कि जहां छात्रों को आवागमन की कोई निश्चित सुविधा प्राप्त है वहां भी वह संतोषजनक नहीं है। आखिर यह एक तथ्य है कि जब-तब स्कूली बसें तरह-तरह के हादसों का शिकार बनती रहती है। क्या यह उम्मीद की जाए कि गुजरात की घटना हमारे नीति-नियंताओं को कोई सबक सिखा सकेगी?
संपादकीय- जागरण

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