Total Pageviews

Tuesday

ऊटपटांग शोध

यह सही हो सकता है कि आदिम युग के इंसाने खाली बैठे हुए और फिजूल के काम करते हुए काम की कई बातें खोज निकाली हों, कई महत्वपूर्ण आविष्कार कर डाले हों, पर जब से मनुष्य थोड़ा अक्लमंद हुआ, यह अपेक्षा की जाने लगी कि वह फालतू की चीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं देगा। न वक्त बर्बाद करेगा, न पैसा जाया करेगा। कम से कम फिजूल की बातों पर लंबी-चौड़ी रिसर्च तो नहीं ही करेगा। पर लगता तो ऐसा है कि कई अजीबोगरीब बातें अब भी लोगों को बेचैन करती हैं और वे उस पर बाकायदा शोध करने में जुट जाते हैं। लोग खुद को संतोष देने के लिए ऐसा करते, तो कोई हर्ज नहीं था, पर जब यूनिवर्सिटियों में एम।फिल. और पी-एच.डी. की डिग्रियों के लिए ऐसे शोध किए जाते हैं, तो हैरानी होती है। जैसे एक किस्सा बेंगलुरु स्थित नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज का है। वहां एक शोधार्थी ने इस बात पर लंबी रिसर्च की है कि लोग दिन में कितनी बार अपनी नाक में उंगली डालते हैं। इसके लिए उंगली का इस्तेमाल करते हैं या पेंसिल भी काम में लाई जाती है? सिर्फ साइकॉलजी में ही ऐसे शोध नहीं हो रहे, बल्कि भाषा, साहित्य, वनस्पति शास्त्र से लेकर लगभग सभी विभागों में लोग फालतू विषयों पर हाथ आजमा रहे हैं। एक रिसर्च पार्कों के नाम के अक्षरों पर चल रही है, तो दूसरी में कबड्डी के जूनियर खिलाड़ियों को आराम देने के कार्यक्रमों पर गौर फरमाया जा रहा है। एक और शोध खोखो की महिला खिलाड़ियों की पर्सनैलिटी की खासियतों का अध्ययन करने पर है। टमाटर के अलग-अलग रंग, जानवरों के मल-मूत्र, कवियों के पहनावे से लेकर अनगिनत ऐसी बातों पर हमारे ही देश में रिसर्च चल रही है, जिनसे असल में सिवाय डिग्री के और कुछ हासिल नहीं होता। ऐसे शोधों की अगर कोई विशेषता हो सकती है, तो सिर्फ इतनी कि शोधार्थी ने बेहद फालतू बात को रिसर्च का विषय बना डालने में कितनी मेहनत की है। इस बारे में रिसर्च गाइडों का तर्क है कि वे यह देखते हैं कि विषय कितना सरल और मौलिक है। पर ऐसी सरलता और मौलिकता भला किस काम की कि ऐसे शोध मूर्खतापूर्ण कामों के लिए दिए जाने वाले पुरस्कार 'इग-नोबेल' के ही उपयुक्त ठहरते हों। हाथी का कुल सर्फेस एरिया नापकर के.पी. श्रीकुमार और स्व. जी. निर्मलन गणित के लिए यह पुरस्कार अर्जित कर ही चुके हैं। मुमकिन है कि फालतू के ऐसे शोध लोग अपने मजे के लिए करते हों, पर सवाल यह है कि क्या ऐसे विषयों पर पी-एच.डी. जैसी डिग्रियां मिलनी चाहिए और सरकार का पैसा उन पर खर्च होना चाहिए?
संपादकीय-नवभारत टाइम्स

No comments: