Tuesday

नई रोशनी

इतिहास के किसी अंधेरे से निकलकर वर्तमान की रोशनी में आने वाला हरेक अध्याय हमारी जिज्ञासा को थोड़ा और झकझोरता है, साथ ही यह उम्मीद भी जगाता है कि हम अपने आदि पूर्वजों के जीवन के बारे में कुछ और जान सकेंगे। पिछले दिनों कोलकाता से करीब ढाई सौ किलोमीटर दूर सुसुनिया गांव में जो ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं, उनहोंने हमारी इस खोज को थोड़ा और विस्तार दिया है। यहां खुदाई में आदिम अभिलेख और प्राचीन औजारों के अलावा जीवाश्म भी मिले हैं जो कुछ पालतू पशुओं, घोड़े, हिरन या उस नस्ल के दूसरे जानवरों के हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये सब करीब एक लाख पुराने हो सकते हैं। हालांकि वहां अब तक मनुष्य का कोई अवशेष नहीं मिला है पर खुदाई में जुटे विशेषज्ञों को विश्वास है कि उन्हें इस स्तर पर जल्दी ही सफलता मिलेगी। अब इस पूरे स्थल की व्यापक खुदाई की जाएगी। उत्खनन की अगुआई कर रहे जी। एल. बदम और प्रो. मणिब्रत भट्टाचार्जी मानते हैं कि इस स्थल पर दस हजार से एक लाख वर्ष पहले के बीच मनुष्य जीवन रहा होगा। यानी यह पैलियोलिथिक और मेसोलिथिक दौर के बीच की बात है। इसकी खासियत यह है कि यहां विभिन्न कालखंडों में रहने वाले लोगों के बीच एक सांस्कृतिक नैरंतर्य दिखाई देता है। सच कहा जाए तो यह अवशेष भारत में आदि मानव के आगमन और उसके रहन-सहन को लेकर अब तक की धारणा को चुनौती देता है। अगर यह वाकई एक लाख साल पहले का है, तो हमें कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता माइकल पेट्राग्लिया और हन्ना जेम्स के निष्कर्ष पर पुनर्विचार करना होगा, जिन्होंने कहा था कि 70 हजार साल पहले आधुनिक (एंथ्रोपोलॉजी के संदर्भ में) मानव अफ्रीका से मध्य पूर्व होते हुए भारत पहुंचा था। गौरतलब है कि अफ्रीका में एक लाख नब्बे हजार साल पहले आधुनिक मानव के सामने आने की बात मानी जाती है। वहीं से वह पूरी दुनिया में फैला। इस तथ्य पर आम सहमति है। लेकिन उसके माइग्रेशन को लेकर कई थ्योरी प्रचलित हैं। नई-नई खोजें उन सिद्धांतों को ध्वस्त कर दे रही हैं। तो क्या सुसुनिया में जो कुछ भी मिल रहा है, वह भारतीय जीवन को नए सिरे से देखने की दृष्टि दे सकता है? हमारे आदि पूर्वजों के आगमन के बारे में नए तथ्यों के आने से कुछ खास विकसित सभ्यताओं के बारे में कायम हमारी मान्यताएं पूरी तरह बदल सकती हैं? विशेषज्ञों को चाहिए कि वे इस काम को अंजाम तक पहुंचाएं ताकि कोई निश्चित नतीजा निकल सके।
संपादकीय-नवभारत टाइम्स

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