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पुराने रूप में नया झगड़ा

यह दु:खद और चिंताजनक है कि कर्नाटक और तमिलनाडु एक बार फिर आमने-सामने आ खड़े हुए हैं। कावेरी जल बंटवारे पर लंबे समय तक झगड़ते रहने के बाद अब वे एक पेयजल परियोजना को लेकर बांहें चढ़ा रहे हैं।तमिलनाडु की होगेंक्काल परियोजना पर कर्नाटक की आपत्तियों के बाद उभय पक्षों की ओर से जैसी बयानबाजी हुई उसने माहौल को इस हद तक खराब कर दिया है कि अब दोनों राज्यों में एक-दूसरे के नागरिकों की सुरक्षा के लिए विशेष उपाय करने पड़ रहे हैं। निश्चित रूप से ऐसा असहिष्णु माहौल बनाने का काम दोनों राज्यों के राजनेताओं ने किया है। चूंकि कर्नाटक में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई है इसलिए इसके आसार अधिक हैं कि होगेंक्काल पेयजल परियोजना को लेकर उभरे विवाद पर राजनीतिक रोटियां सेंकने में कोई कोर कसर छोड़ी नहीं जाएगी। तमिलनाडु की इस परियोजना के विरोध में प्रदेशव्यापी बंद का आयोजन करना और राज्य में तमिल फिल्मों का प्रदर्शन और चैनलों का प्रसारण बंद कराने के प्रयास यही बताते हैं कि कर्नाटक के राजनेता कुछ ज्यादा ही उग्रता दिखा रहे हैं। यह उग्रता तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के उस बयान का नतीजा भी हो सकती है जिसमें उन्होंने हर हाल में होगेंक्काल परियोजना को पूरा करने की घोषणा की थी। क्या उनके लिए ऐसी सख्त घोषणा करना आवश्यक था? जो भी हो, यह सहज ही समझा जा सकता है कि दोनों राज्यों में कुछ तत्व ऐसे हैं जो कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच अमैत्री को हवा देना चाहते हैं। यदि ऐसा नहीं होता दोनों प्रांतों में एक-दूसरे की भावनाओं को चोट पहुंचाने वाले बयान नहीं दिए जा रहे होते। अब तो इन बयानों के अनुरूप कृत्य भी किए जा रहे हैं और यही कारण है कि दोनों राज्यों में बस सेवाएं तथा केबल नेटवर्क प्रभावित हो रहा है।
चूंकि होगेंक्काल परियोजना को लेकर ट्रेन सेवाओं को प्रभावित करने की धमकी दी जा रही है और गैर राजनीतिक व्यक्ति एवं संगठन भी असंयमित तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आगे आ रहे हैं इसलिए केंद्र सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। सच तो यह है कि उसे अब तक ऐसा कर देना चाहिए था। ऐसे गंभीर विवादों पर केंद्रीय सत्ता की देखो और इंतजार करो की नीति कुल मिलाकर उसकी दुर्बलता को ही प्रकट करती है। संप्रग सरकार को यह विस्मृत नहीं करना चाहिए कि विगत में कावेरी जल विवाद पर दोनों राज्यों में किस तरह हिंसा भड़क चुकी है? कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लागू होने के कारण केंद्र को खास तौर पर तत्परता दिखानी चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि उसके संज्ञान में दोनों राज्यों के बीच इस तरह का समझौता हो चुका है कि वे एक-दूसरे की पेयजल परियोजनाओं का विरोध नहीं करेंगे। आखिर इस समझौते के बावजूद विवाद क्यों बढ़ाया जा रहा है? केंद्रीय सत्ता को दोनों राज्यों को यह सख्त हिदायत देने में संकोच नहीं करना चाहिए कि वे झगड़ालू पड़ोसी राष्ट्रों की तरह व्यवहार करना छोड़ें, क्योंकि उनके बीच का बैर संघीय व्यवस्था का अनादर और राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा है। वैसे ये दोनों राज्य चाहें तो इस मामले में उत्तर भारत से सीख ले सकते हैं, जहां विभिन्न राज्यों के बीच जल विवाद तो हैं, लेकिन उनकी तनिक भी छाया उनके लोगों पर नहीं पड़ती।
संपादकीय- जागरण
04 अप्रैल 2008

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